श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.5.47 
तथापरे चात्मसमाधियोग-
बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।
त्वामेव धीरा: पुरुषं विशन्ति
तेषां श्रम: स्यान्न तु सेवया ते ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसे दूसरे लोग भी हैं जो दिव्य आत्म-साक्षात्कार द्वारा शांत हो जाते हैं और प्रबल शक्ति और ज्ञान के द्वारा प्रकृति के गुणों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, वे भी आपमें प्रवेश करते हैं, लेकिन उन्हें बहुत पीड़ा होती है, जबकि भक्त केवल भक्ति-मय सेवा करता है और उसे ऐसा कोई दर्द महसूस नहीं होता।
 
Other persons also, who are pacified by transcendental Self-realization and who have conquered the modes of nature by great power and knowledge, enter into You, but they have to suffer a lot, whereas a devotee simply performs devotional service and has no such suffering.
तात्पर्य
प्रेम की श्रम और उसके प्रतिफल के संदर्भ में, भक्त, या भगवान् के भक्तों को हमेशा ही व्यक्तियों की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है जो ज्ञानियों या निराकारवादियों और योगियों या रहस्यवादियों को पसंद करते हैं। सम्बन्ध में, अपरे (अन्य) शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। "अन्य" का तात्पर्य ज्ञानियों और योगियों से है, जिनकी एकमात्र आशा निराकार ब्रह्मज्योति के अस्तित्व में विलीन हो जाना है। यद्यपि गंतव्य भक्तों के गंतव्य की तुलना में इतना महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन गैर भक्तों का श्रम भक्तों की तुलना में बहुत अधिक है। कोई यह सुझाव दे सकता है कि भक्ति सेवा के निर्वहन के मामले में भक्तों के लिए भी पर्याप्त परिश्रम है। किन्तु उस परिश्रम की पूर्ति भौतिक सुखों की वृद्धि से होती है। भक्तों को भगवान की निरंतर सेवा में लगे रहने पर अधिक आनंद मिलता है, जब उनके पास ऐसा कोई काम नहीं होता है। एक पुरुष और एक महिला के पारिवारिक संयोजन में उन दोनों के लिए बहुत मेहनत और जिम्मेदारी है, फिर भी जब वे अकेले होते हैं तो वे अपनी एकजुट गतिविधियों की कमी के कारण अधिक परेशानी महसूस करते हैं। निराकारवादियों का मिलन और भक्तों का मिलन एक समान नहीं है। निराकारवादी अपनी व्यक्तित्व को पूरी तरह से समाप्त करके सयुज्य-मुक्ति या एकता में विलय करके प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जबकि भक्त अपनी व्यक्तित्व को सर्वोच्च व्यक्तिगत भगवान् के साथ संबंधों में भावनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए बनाए रखते हैं। भावनाओं का ऐसा पारस्परिक व्यवहार पारलौकिक वैकुण्ठ के ग्रहों में होता है, और इसलिए निराकारवादियों द्वारा मांगी गई मुक्ति भक्ति सेवा में पहले से ही प्राप्त हो चुकी है। भक्त स्वचालित रूप से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं, जबकि व्यक्तित्व बनाए रखने के पारलौकिक आनंद को जारी रखते हुए। जैसा कि पिछले श्लोक में समझाया गया है, भक्तों का गंतव्य वैकुण्ठ या अकुण्ठ-धिशण्या है, वह स्थान जहां चिंताओं को पूरी तरह से मिटा दिया जाता है। किसी को भी भक्तों के गंतव्य और निराकारवादियों के गंतव्य को एक समान नहीं समझ लेना चाहिए। गंतव्य अलग-अलग होते हैं, और भक्त द्वारा प्राप्त पारलौकिक आनंद भी सिन्-मात्र या आध्यात्मिक भावनाओं से अलग होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)