तान् वै ह्यसद्वृत्तिभिरक्षिभिर्ये
पराहृतान्तर्मनस: परेश ।
अथो न पश्यन्त्युरुगाय नूनं
ये ते पदन्यासविलासलक्ष्या: ॥ ४५ ॥
अनुवाद
हे महान परमेश्वर, जिन अपराधियों की आत्मा बाहरी भौतिकतावादी गतिविधियों से बहुत अधिक प्रभावित होती है, वे आपके कमल जैसे चरणों को नहीं देख सकते हैं, परन्तु आपके शुद्ध भक्त उन्हें देख पाते हैं, क्योंकि उनका एकमात्र लक्ष्य आपके कार्यों का दिव्य भाव से आनंद लेना है।
O great Supreme Lord, sinful persons whose inner vision is overly influenced by external materialistic activities cannot see Your feet, but Your pure devotees can see Your feet, because their sole purpose is to enjoy Your activities in a transcendental sense.
तात्पर्य
जैसा भगवद-गीता (18.61) में कहा गया है, भगवान प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। यह स्वाभाविक है कि व्यक्ति को भगवान को कम से कम अपने हृदय में देखना चाहिए। किंतु जो लोग अपने बाहरी कार्यों के आच्छादन के कारण अपने आंतरिक दृष्टिकोण को खो चुके हैं, उनके लिए यह संभव नहीं है। शुद्ध आत्मा जो चैतन्य की विशेषता है, उसे सहज ही सामान्य व्यक्ति भी देख सकता है क्योंकि चैतन्य पूरे शरीर में व्याप्त है। भगवद-गीता में जिस योग प्रणाली की सिफारिश की गई है, वह है मानसिक क्रियाओं को आंतरिक रूप से केंद्रित करना और इस प्रकार अपने अंदर भगवान के कमल चरण देखना। किंतु ऐसे कई कथित योगी हैं जो भगवान से संबंधित नहीं हैं, बल्कि केवल चैतन्य से संबंधित हैं, जिसे वे अपनी अंतिम प्राप्ति के रूप में स्वीकार करते हैं। चैतन्य की ऐसी उपलब्धि भगवद-गीता में केवल कुछ ही मिनटों में सिखाई गई है, जबकि कथित योगियों को इसे प्राप्त करने में निरंतर वर्षों लगते हैं क्योंकि वे भगवान के चरणों में अपराध करते हैं। सबसे बड़ा अपराध यह है कि व्यक्तिगत आत्मा से अलग भगवान के अस्तित्व का खंडन किया जाए या भगवान और व्यक्तिगत आत्मा को एक ही माना जाए। निर्वैयक्तिक भगवदवादियों ने प्रतिबिंब के सिद्धांत की ग़लत व्याख्या की है और इस प्रकार उन्होंने व्यक्तिगत चैतन्य को सर्वोच्च चैतन्य के रूप में स्वीकार किया है। सर्वोच्च के प्रतिबिंब के सिद्धांत को कोई भी ईमानदार सामान्य व्यक्ति बिना कठिनाई के स्पष्ट रूप से समझ सकता है। जब पानी पर आकाश का प्रतिबिंब होता है, तो आकाश और तारे दोनों ही पानी के भीतर दिखाई देते हैं, लेकिन यह समझा जाता है कि आकाश और तारों को एक ही स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। तारे आकाश के भाग हैं और इसलिए वे पूर्ण के बराबर नहीं हो सकते। आकाश संपूर्ण है और तारे उसके भाग हैं। वे अभिन्न और एकरूप नहीं हो सकते। तत्वज्ञानी जो व्यक्तिगत चैतन्य से अलग सर्वोच्च चैतन्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे उतने ही अपराधी हैं जितने कि भौतिकवादी जो कि भगवान के अस्तित्व को भी नकारते हैं। ऐसे अपराधी वास्तव में अपने अंदर भगवान के चरणों को नहीं देख सकते हैं और वे भगवान के भक्तों को भी नहीं देख सकते हैं। भगवान के भक्त इतने दयालु होते हैं कि वे लोगों को ईश्वर-चैतन्य में प्रबुद्ध करने के लिए सभी स्थानों पर विचरण करते हैं। हालाँकि, अपराधी भगवान के भक्तों को प्राप्त करने का मौका खो देते हैं, जबकि पापरहित सामान्य व्यक्ति भक्तों की उपस्थिति से तुरंत प्रभावित हो जाते हैं। इस संबंध में एक शिकारी और देवर्षि नारद की एक दिलचस्प कहानी है। जंगल में एक शिकारी, जो एक महान पापी था, वह जानबूझकर अपराधी नहीं था। वह तुरंत नारद की उपस्थिति से प्रभावित हुआ और वह अपनी कुटिया और घर छोड़कर भक्ति का मार्ग अपनाने के लिए सहमत हो गया। लेकिन अपराधी नलकुवर और मणिग्रीव, भले ही देवताओं के बीच रहते थे, उन्हें अपने अगले जन्मों में वृक्ष बनने की सजा मिली, हालाँकि एक भक्त के अनुग्रह से उन्हें बाद में भगवान द्वारा मुक्त कर दिया गया। अपराधियों को तब तक इंतजार करना पड़ता है जब तक उन्हें भक्तों की दया प्राप्त नहीं हो जाती और तब वे अपने भीतर भगवान के चरणों को देखने के योग्य बन सकते हैं। लेकिन अपने अपराधों और अपनी अत्यधिक भौतिकता के कारण वे भगवान के भक्तों को भी नहीं देख सकते। बाहरी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण वे अपने आंतरिक दृष्टिकोण को नष्ट कर देते हैं। हालाँकि, भगवान के भक्त मूर्खों के अपराधों को अपने कई स्थूल और सूक्ष्म शारीरिक प्रयासों में ध्यान नहीं देते हैं। भगवान के भक्त ऐसे सभी अपराधियों पर बिना किसी हिचकिचाहट के भक्ति का आशीर्वाद बरसाते रहते हैं। यही भक्तों का स्वभाव है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥