केवल आपके चरण-कमलों के बारे में उत्सुकता पूर्वक श्रवण करके और हृदय में उन पर ध्यान लगाकर मनुष्य तुरंत ही ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है और वैराग्य के बल पर शांति का अनुभव करता है। इसलिए हमें आपके चरण-कमलों की शरण में जाना चाहिए।
By merely listening with curiosity and devotion about your feet and meditating on them in the heart, a person is instantly enlightened with knowledge and becomes peaceful by the power of detachment. Therefore, we should take shelter of the holy abode of your feet.
तात्पर्य
भगवान के चरण-कमलों का ध्यान करने की उत्सुकता और भक्ति के चमत्कार इतने महान हैं कि कोई अन्य प्रक्रिया इसकी तुलना नहीं कर सकती। भौतिकवादी व्यक्तियों के दिमाग इतने अशांत हैं कि उनके लिए व्यक्तिगत नियमित प्रयासों से परम सत्य की खोज करना लगभग असंभव है। लेकिन ऐसे भौतिकवादी भी, जो दिव्य नाम, ख्याति, गुणों आदि को सुनने में थोड़ी उत्सुकता रखते हैं, वे ज्ञान और वैराग्य प्राप्त करने के अन्य सभी तरीकों को पार कर सकते हैं। सशर्त आत्मा देह-धारणा के स्वरूप से जुड़ी होती है, और इसलिए वह अज्ञानता में है। आत्म-ज्ञान की शिक्षा से भौतिक स्नेह से वैराग्य प्राप्त किया जा सकता है, और इस तरह के वैराग्य के बिना ज्ञान का कोई मतलब नहीं है। भौतिक सुख के लिए सबसे जिद्दी लगाव यौन जीवन है। जो यौन जीवन से जुड़ा हुआ है, उसे ज्ञान से रहित समझा जाना चाहिए। ज्ञान के बाद वैराग्य आना चाहिए। यही आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है। आत्म-साक्षात्कार के लिए ये दो अनिवार्यताएँ- ज्ञान और वैराग्य- बहुत जल्दी प्रकट हो जाते हैं यदि कोई भगवान के चरण-कमलों की भक्ति-भावना करता है। इस संबंध में धीर शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति जो अशांति के कारणों की उपस्थिति में भी विचलित नहीं होता है उसे धीर कहा जाता है। श्री यमुनाचार्य कहते हैं, "जब से मेरा हृदय भगवान कृष्ण की भक्ति-भावना से अभिभूत हो गया है, मैं यौन जीवन के बारे में सोच भी नहीं सकता हूँ, और अगर यौन जीवन के विचार मेरे मन में आते हैं तो मैं तुरंत घृणा महसूस करता हूँ।" भगवान का भक्त भगवान के चरण-कमलों का उत्सुकतापूर्वक मनन करके एक उन्नत धीर बन जाता है। भक्ति-भावना में उचित आध्यात्मिक गुरु द्वारा दीक्षित होना और प्रभु के बारे में सुनने के संबंध में उनके निर्देशों का पालन करना शामिल है। ऐसा उचित आध्यात्मिक गुरु प्रभु के बारे में उससे नियमित रूप से सुनने के द्वारा स्वीकार किया जाता है। ज्ञान और वैराग्य में सुधार को भक्त वास्तविक अनुभव के रूप में देख सकते हैं। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने उचित भक्त से सुनने की इस प्रक्रिया की दृढ़ता से सिफारिश की, और इस प्रक्रिया का पालन करके व्यक्ति सर्वोच्च परिणाम प्राप्त कर सकता है, अन्य सभी विधियों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥