श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.5.41 
मार्गन्ति यत्ते मुखपद्मनीडै-
श्छन्द:सुपर्णैऋर्षयो विविक्ते ।
यस्याघमर्षोदसरिद्वराया:
पदं पदं तीर्थपद: प्रपन्ना: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के चरणकमल ही सारे पवित्र स्थानों की शरण हैं। पवित्र मनवाले महान ऋषि-मुनि वेदों की पंखों पर सवार होकर सदा आपके कमल जैसे मुखरूपी घोंसले को खोजना करते हैं। उनमें से कुछ सर्वश्रेष्ठ नदी (गंगा) के सहारे आपके चरणकमलों का आश्रय लेते हैं, जो मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति दिला सकता है।
 
The Lord's lotus feet are themselves the shelter of all holy places. The great sages with pure minds, flying with the wings of the Vedas, always search for the nest of your lotus-like face. Some of them take refuge in the best river (Ganga) and take refuge at every step in your feet, which can deliver a man from all the consequences of sin.
तात्पर्य
परमहंस की तुलना राजसी हंसों से की जाती है जो कमल के फूलों की पंखुड़ियों पर अपना घोंसला बनाते हैं। प्रभु के सांसारिक शरीर के अंगों की तुलना हमेशा कमल के फूल से की जाती है क्योंकि भौतिक जगत में कमल का फूल सुंदरता की अंतिम परिभाषा है। संसार में सबसे सुंदर चीज वेद या भगवद गीता है, क्योंकि उसमें परमेश्वर स्वयं ज्ञान प्रदान करते हैं। परमहंस प्रभु के कमल जैसे चेहरे पर अपना घोंसला बनाते हैं और हमेशा उनके चरण कमलों की शरण लेते हैं, जहाँ वैदिक ज्ञान के पंखों द्वारा पहुँचा जा सकता है। चूँकि प्रभु सभी चीजों के मूल स्रोत हैं, बुद्धिमान व्यक्ति, वैदिक ज्ञान से प्रबुद्ध होकर, प्रभु की शरण लेते हैं, जैसे पक्षी जो घोंसला छोड़ने के बाद पूरा विश्राम लेने के लिए फिर से घोंसले की तलाश करते हैं। सभी वैदिक ज्ञान परमेश्वर को समझने के लिए होता है, जैसा कि प्रभु ने भगवद गीता (15.15) में कहा है: वेदईश्च सर्वैरहम एव वेद्यः। बुद्धिमान व्यक्ति, जो हंसों के समान हैं, हर तरह से प्रभु की शरण लेते हैं और मानसिक स्थिति पर मंडराते नहीं हैं, अलग-अलग दर्शनशास्त्रों पर निरर्थक अटकलें लगाते हुए। प्रभु इतने दयालु हैं कि उन्होंने पूरे ब्रह्मांड में गंगा नदी का प्रसार किया है ताकि उस पवित्र नदी में स्नान करके हर कोई पापों के प्रतिकर्मों से मुक्ति पा सके, जो हर कदम पर होते रहते हैं। दुनिया में कई नदियाँ हैं जो केवल उनमें स्नान करने से ईश्वर चेतना को जगा सकती हैं, और उनमें से गंगा नदी सबसे प्रमुख है। भारत में पाँच पवित्र नदियाँ हैं, लेकिन गंगा सबसे पवित्र है। गंगा नदी और भगवद गीता मानव जाति के लिए पारलौकिक आनंद के मुख्य स्रोत हैं, और बुद्धिमान व्यक्ति उनका सहारा लेकर अपने घर, ईश्वर के पास वापस जा सकते हैं। यहाँ तक ​​कि श्रीपाद शंकराचार्य भी सलाह देते हैं कि भगवद गीता के बारे में थोड़ा ज्ञान और गंगा के पानी की थोड़ी मात्रा पीने से यमराज के दंड से बचा जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)