धातर्यदस्मिन् भव ईश जीवा-
स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म ।
आत्मन्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि-
च्छायां सविद्यामत आश्रयेम ॥ ४० ॥
अनुवाद
हे पिता, हे हमारे प्रभु, हे भगवान्, इस भौतिक संसार के जीवों को कभी सुख प्राप्त नहीं हो सकता है। वे तीन प्रकार के कष्टों से अभिभूत रहते हैं। इसलिए, वे आपके चरणकमलों की छाया में शरण लेते हैं जो ज्ञान से परिपूर्ण हैं। हम भी उन्हीं चरणकमलों की शरण लेते हैं।
O Father, O Lord, O Supreme Personality of Godhead, living entities in this material world can never find any happiness because they are overwhelmed by three kinds of suffering. Therefore they take refuge in the shadow of Your feet, which are full of knowledge, and so we also take refuge in Thee.
तात्पर्य
भक्ति का मार्ग न तो भावुक होता है न ही लौकिक। यह वास्तविकता का मार्ग है जिसके द्वारा सजीव इकाई तीन प्रकार के भौतिक कष्टों से मुक्त होने की पारलौकिक ख़ुशी प्राप्त कर सकती है - शरीर और मन से पैदा होने वाले कष्ट, अन्य जीवित इकाइयों से और प्राकृतिक गड़बड़ियों से। वह हर कोई जो भौतिक अस्तित्व से बंधा हुआ है - चाहे वो आदमी हो या जानवर या देवता या पक्षी - अवश्य ādhyātmika (शारीरिक या मानसिक) पीड़ाओं, ādhibhautika पीड़ाओं (जिनको जीवित प्राणियों द्वारा किया जाता है), और ādhidaivika पीड़ाओं (जो प्रकृति की गड़बड़ियों की वजह से होती हैं) से गुज़रना होगा। उसकी खुशियां सशर्त जीवन के कष्टों से मुक्त होने के लिए एक कठिन संघर्ष के अलावा कुछ नहीं हैं। लेकिन सिर्फ़ एक ही ऐसा तरीका है जिससे उसे बचाया जा सकता है, और वो है भगवान के कमल चरणों की शरण स्वीकार करके। यह तर्क कि जिसके पास सही ज्ञान नहीं होता है, उसे भौतिक कष्टों से मुक्त नहीं किया जा सकता, निस्संदेह सत्य है। लेकिन चूँकि भगवान के कमल चरण पारलौकिक ज्ञान से भरे हुए होते हैं, तो उनके कमल चरणों को स्वीकार करना उस ज़रूरत को पूरा कर देता है। हम पहले ही इस बिंदु पर प्रथम कैन्टो (1.2.7) में चर्चा कर चुके हैं: vāsudeve bhagavati bhakti-yogaḥ prayojitaḥ janayaty aśu vairāgyaṁ jñānaṁ ca yad ahaitukam वासुदेव की भक्ति सेवा में कभी ज्ञान की कमी नहीं होती है, जो कि भगवान का व्यक्तित्व है। वो, भगवान, स्वयं भक्त के हृदय से अज्ञानता के अंधकार को मिटाने का ज़िम्मा लेते हैं। वो इसकी पुष्टि भगवद-गीता (10.10) में करते हैं: teṣāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakaṁ dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayānti te जो भक्त हमेशा जुड़े रहते हैं, प्रेमपूर्वक पूजा करते हैं, मैं उन्हें अपनी बुद्धि-योग देता हूँ, जिसके ज़रिए वो मुझे प्राप्त कर लेते हैं। भौतिक अस्तित्व के तिहरे कष्टों से छुटकारा दिलाने में व्यावहारिक दार्शनिक अनुमान कोई मदद नहीं कर सकते। सिर्फ़ भगवान के प्रति समर्पित हुए बिना ज्ञान के लिए प्रयास करना कीमती समय की बर्बादी है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥