ज्ञान,योगी और कर्मियों को भगवान के इस तरह के प्रत्यक्ष सहयोग की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। वे पारलौकिक प्रेममय सेवा से भगवान को संतुष्ट करने में सक्षम नहीं है, न ही वे भगवान की ऐसी सेवा में विश्वास करते हैं। भक्ति प्रक्रिया, जैसा कि वैधी-भक्ति या निर्धारित नियमों और कानूनों का पालन करने वाली भक्ति सेवा के नियमन सिद्धांतों के तहत की जाती है, को प्रकटित धर्मग्रंथों द्वारा परिभाषित किया गया है और महान आचार्यों द्वारा पुष्ट किया गया है। यह अभ्यास नौसिखिए भक्त को राग-भक्ति के चरण तक पहुँचने में मदद कर सकता है, जिसमें भगवान भीतर से चैत्य-गुरु या अध्यात्मिक गुरु के रूप में अतिचेतना के रूप में प्रतिक्रिया करते हैं। भक्तों के अलावा सभी पारलौकिकतावादी व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं क्योंकि वे अतिचेतना और व्यक्तिगत चेतना को एक और समान होने के रूप में गलत तरीके से समझते हैं। अध्यात्म के विरूद्ध इस तरह की गलतफहमी उन्हें भीतर से किसी भी दिशा को प्राप्त करने के लिए अयोग्य बना देती है, और इसलिए वे भगवान के प्रत्यक्ष सहयोग से वंचित रह जाते हैं। अनेक जन्मों के बाद, जब ऐसा अद्वैतवादी यह समझता है कि भगवान पूजनीय है और भक्त एक साथ भगवान के साथ एक और अलग है, तो केवल तभी वह भगवान वासुदेव के समक्ष आत्मसमर्पण कर सकता है। शुद्ध भक्ति सेवा उस बिंदु से शुरू होती है। भ्रमित अद्वैतवादी द्वारा अपनाई गई परम सत्य को समझने की प्रक्रिया बहुत कठिन होती है, जबकि भक्तों के लिए परम सत्य को समझने का तरीका सीधे भगवान से आता है, जो भक्ति सेवा से प्रसन्न होते हैं। कई नौसिखिए भक्तों की ओर से, विदुर ने बहुत पहले ही मैत्रेय से भक्ति सेवा के मार्ग के बारे में पूछताछ की थी, जिससे हृदय में विराजमान भगवान प्रसन्न हो सकते हैं।
