श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.5.39 
देवा ऊचु:
नमाम ते देव पदारविन्दं
प्रपन्नतापोपशमातपत्रम् ।
यन्मूलकेता यतयोऽञ्जसोरु-
संसारदु:खं बहिरुत्क्षिपन्ति ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
देवताओं ने कहा: हे भगवन, आपके चरणकमल शरणागतों के लिए छत्र तुल्य हैं, जो उन्हें संसार के समस्त कष्टों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। सभी मुनिगण उसी शरण में आकर सारे भौतिक कष्टों को त्याग देते हैं। इसलिए, हम आपके चरणकमलों को सादर नमन करते हैं।
 
The gods said: O Lord, your feet are like umbrellas for those who seek refuge, which protect them from all the troubles of the world. All the sages throw away all material troubles under that shelter. Therefore, we offer our respectful obeisances to your feet.
तात्पर्य
ऐसे अनेक ऋषि और संत हैं जो पुनर्जन्म और अन्य सभी भौतिक दुखों से मुक्ति पाने का प्रयास करने में लगे रहते हैं। किन्तु उन सभी में से, जो लोग भगवान के कमल चरणों में शरण लेते हैं वे सभी ऐसे दुखों को कठिनाई के बिना पूरी तरह से दूर कर सकते हैं। अन्य, जो विभिन्न प्रकार से पारलौकिक गतिविधियों में लगे हुए हैं, ऐसा नहीं कर सकते। उनके लिए यह बहुत कठिन है। वे भगवान के कमल चरणों की शरण स्वीकार किए बिना कृत्रिम रूप से मुक्त होने के बारे में सोच सकते हैं, किन्तु वह संभव नहीं है। ऐसी झूठी मुक्ति से व्यक्ति भौतिक अस्तित्व में अवश्य ही फिर से आ जाता है, भले ही वह कठोर तपस्या और संयम साधा हो। यह देवताओं की राय है, जो न केवल वैदिक ज्ञान में पारंगत हैं बल्कि अतीत, वर्तमान और भविष्य के देखने वाले भी हैं। देवताओं की राय मूल्यवान हैं क्योंकि देवता सार्वभौमिक प्रबंधन के मामलों में पदों को धारण करने के लिए अधिकृत हैं। वे भगवान द्वारा उनके विश्वासपात्र सेवक के रूप में नियुक्त किए गए हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)