जो कोई भी भगवान और देवताओं को एक ही स्तर पर रखता है उसे पाषंडी, या नास्तिक कहा जाता है| देवताओं की पूजा उन लोगों द्वारा की जाती है जो कमोबेश ज्ञान, योग और कर्म की प्रक्रियाओं के अनुयायी हैं, अर्थात, अवैयक्तिकवादी, ध्यान करने वाले और फलदायी कार्यकर्ता| भक्त, हालांकि, केवल सर्वोच्च भगवान विष्णु की पूजा करते हैं| यह पूजा किसी भी भौतिक लाभ के लिए नहीं है, जैसा कि सभी भौतिकवादियों द्वारा, यहाँ तक कि मुक्तिवादियों, रहस्यवादियों और फलदायी कार्यकर्ताओं द्वारा वांछित है| भक्त भगवान के लिए अति निष्ठ भक्ति प्राप्त करने के लिए सर्वोच्च भगवान की पूजा करते हैं| हालाँकि, भगवान की पूजा दूसरों द्वारा नहीं की जाती है, जिनके पास ईश्वर के प्रेम को प्राप्त करने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है, जो मानव जीवन का आवश्यक उद्देश्य है| भगवान के साथ प्रेमपूर्ण संबंध से विमुख व्यक्ति कमोबेश अपने स्वयं के कार्यों से निंदा करते हैं|
भगवान प्रत्येक जीवित सत्ता के समान है, बिल्कुल बहती गंगा की तरह| गंगा जल सभी के शुद्धिकरण के लिए है, फिर भी गंगा के तट पर पेड़ों का अलग-अलग मूल्य है| गंगा के तट पर एक आम का पेड़ पानी पीता है, और नीम का पेड़ भी वही पानी पीता है| लेकिन दोनों पेड़ों के फल अलग-अलग होते हैं| एक असाधारण रूप से मीठा है, और दूसरा नारकीय रूप से कड़वा है| नीम की निंदित कड़वाहट उसके अपने पिछले कर्म के कारण है, जिस तरह आम की मिठास भी अपने कर्म के कारण है| भगवान ने भगवद-गीता (16.19) में कहा है:
तान अहम् द्विषत: क्रू:रां:
संसारेषु नराधमान:
क्षिपाम्य अजस्रं अशुभान:
आसुरीषु एव योनिसु
"ईर्ष्यालु, शरारती, मानव जाति में सबसे नीच - इन सबको मैं हमेशा भौतिक अस्तित्व के सागर में वापस डाल देता हूँ, जीवन की विभिन्न आसुरी प्रजातियों में|" यमराज और अन्य नियंत्रक जैसे देवता उन अवांछित सशर्त आत्माओं के लिए हैं जो हमेशा ईश्वर के राज्य की शांति को खतरे में डालने में लगे रहते हैं| चूँकि सभी देवता भगवान के गोपनीय भक्त-सेवक हैं, इसलिए उनकी कभी निंदा नहीं की जानी चाहिए|
