श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.5.36 
ज्योतिषाम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वद्ब्रह्मवीक्षितम् ।
महीं गन्धगुणामाधात्कालमायांशयोगत: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, बिजली से उत्पन्न जल पर भगवान् ने दृष्टिपात किया और फिर उसमें शाश्वत समय और बाहरी ऊर्जा का मिश्रण हुआ। इस तरह वह पृथ्वी में परिवर्तित हुआ, जो मुख्यतः गंध के गुण से युक्त है।
 
Thereafter, God looked at the water produced by lightning and then eternal and external energy got mixed in it. In this way, it got transformed into earth which is primarily endowed with the quality of smell.
तात्पर्य
ऊपर के श्लोकों में दिए हुए भौतिक तत्वों के वर्णनों से यह स्पष्ट है कि सभी अवस्थाओं में सर्वोच्च की झलक अन्य चीजों के साथ और बदलाव की आवश्यकता होती है। हर बदलाव में, अंतिम रूप भगवान की झलक होती है, जो एक चित्रकार की तरह कार्य करते हैं, जब वह एक विशेष रंग बनाने के लिए विभिन्न रंगों को मिलाते हैं। जब एक तत्व दूसरे तत्व के साथ मिलता है, तो उसके गुणों की संख्या बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, आकाश हवा का कारण है। आकाश में केवल एक ही गुण है, अर्थात ध्वनि, लेकिन आकाश और भगवान की झलक की बातचीत से, जो कि शाश्वत समय और बाहरी प्रकृति से मिलकर बनी है, हवा का निर्माण होता है, जिसमें दो गुण होते हैं: ध्वनि और स्पर्श। इसी तरह, हवा के बनने के बाद, समय से स्पर्श किए गए आकाश और हवा की बातचीत, भगवान की बाहरी ऊर्जा से, बिजली का उत्पादन करती है। इसके बाद, हवा और आकाश के साथ बिजली की बातचीत, समय से मिलकर, बाहरी ऊर्जा और भगवान की उनके ऊपर की झलक, पानी का उत्पादन करती है। आकाश के अंतिम चरण में एक गुण है, अर्थात ध्वनि; हवा में दो गुण, ध्वनि और स्पर्श; बिजली में तीन गुण, अर्थात ध्वनि, स्पर्श और रूप; पानी में चार गुण: ध्वनि, स्पर्श, रूप और स्वाद; और भौतिक विकास के अंतिम चरण में परिणाम पृथ्वी है, जिसमें सभी पाँच गुण हैं - ध्वनि, स्पर्श, रूप, स्वाद और गंध। यद्यपि वे विभिन्न सामग्रियों के अलग-अलग मिश्रण हैं, ऐसे मिश्रण स्वचालित रूप से नहीं होते हैं, जैसे किसी जीवित चित्रकार के स्पर्श के बिना रंगों का मिश्रण स्वचालित रूप से नहीं होता है। स्वचालित प्रणाली वास्तव में भगवान के नज़र डालने वाले स्पर्श द्वारा सक्रिय होती है। सभी भौतिक परिवर्तनों में जीवित चेतना अंतिम शब्द है। इस तथ्य का उल्लेख भगवद्-गीता (9.10) में इस प्रकार है:

मायाध्यक्षेण प्रकृति:

सूयते सा-चराचरम्

हेतुनानेन कौन्तेय

जगद् विपरिवर्तते

निष्कर्ष यह है कि भौतिक तत्व आम आदमी की नज़र में बहुत ही आश्चर्यजनक रूप से काम कर सकते हैं, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली वास्तव में भगवान की निगरानी में होती है। जो केवल भौतिक तत्वों के परिवर्तनों को ही चिह्नित कर सकते हैं और उनके पीछे भगवान के छिपे हुए हाथों को नहीं देख सकते हैं, वे निश्चित रूप से कम बुद्धिमान व्यक्ति हैं, हालांकि उन्हें महान भौतिक वैज्ञानिक के रूप में विज्ञापित किया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)