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श्लोक 3.5.34  |
अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वित: ।
ससर्ज रूपतन्मात्रं ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ ३४ ॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात अतीव शक्तिशाली वायु ने आकाश के साथ परस्पर क्रिया करके इन्द्रिय अनुभूति (तन्मात्रा) का रूप उत्पन्न किया और रूप की अनुभूति बिजली में बदल गई जो कि संसार को देखने के लिए प्रकाश है। |
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| तत्पश्चात अतीव शक्तिशाली वायु ने आकाश के साथ परस्पर क्रिया करके इन्द्रिय अनुभूति (तन्मात्रा) का रूप उत्पन्न किया और रूप की अनुभूति बिजली में बदल गई जो कि संसार को देखने के लिए प्रकाश है। |
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