महत् तत्त्व, यानी महान कारण रूप सत्य, मिथ्या अहंकार में बदल जाता है। यह मिथ्या अहंकार तीन अवस्थाओं में प्रकट होता है - कारण, कार्य और कर्ता। यह सारी गतिविधियाँ मानसिक धरातल पर होती हैं और भौतिक तत्वों, स्थूल इंद्रियों और मानसिक विचारों पर आधारित होती हैं। यह मिथ्या अहंकार तीन अलग-अलग गुणों में दिखाई देता है - सत्व, रज और तम।
The Mahat Tattva or the great causal reality transforms into the false ego, which manifests itself in three states—as cause, effect and doer. All such activities take place on the mental plane and are based on the physical elements, gross senses and mental thoughts. The false ego manifests itself in three different gunas—Sato, Rajo and Tamo.
तात्पर्य
अपनी मूल आध्यात्मिक स्थिति में शुद्ध आत्मा, प्रभु के शाश्वत सेवक के रूप में अपने संवैधानिक स्थिति के बारे में पूरी तरह से जागरूक है। सभी आत्माएं जो ऐसी शुद्ध चेतना में स्थित हैं, मुक्त हैं, और इसलिए वे आध्यात्मिक आकाश में विभिन्न वैकुण्ठ ग्रहों में अनन्त काल तक आनंद और ज्ञान में रहते हैं। जब भौतिक सृजन प्रकट होता है, तो यह उनके लिए नहीं होता है। सदा मुक्त आत्माओं को नित्य-मुक्त कहा जाता है, और उनका भौतिक सृजन से कोई लेना-देना नहीं है। भौतिक सृजन विद्रोही आत्माओं के लिए है जो सर्वोच्च प्रभु के अधीनता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। झूठे प्रभुत्व की इस भावना को मिथ्या अहंकार कहा जाता है। यह भौतिक प्रकृति के तीन गुणों में प्रकट होता है, और यह केवल मानसिक अटकलों में मौजूद होता है। जो लोग सद्गुण के गुण में हैं, वे सोचते हैं कि हर एक व्यक्ति भगवान है, और इस तरह वे शुद्ध भक्तों पर हंसते हैं, जो भगवान की दिव्य प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न होने की कोशिश करते हैं। जो लोग जुनून के गुण से भरे हुए हैं, वे विभिन्न तरीकों से भौतिक प्रकृति पर प्रभुता करने की कोशिश करते हैं। उनमें से कुछ परोपकारी गतिविधियों में संलग्न हैं जैसे कि वे एजेंट थे जो अपनी मानसिक अटकलों की योजनाओं द्वारा दूसरों के लिए अच्छा करने के लिए नियुक्त किए गए थे। ऐसे लोग सांसारिक परोपकारिता के मानक तरीकों को स्वीकार करते हैं, लेकिन उनकी योजनाएँ मिथ्या अहंकार के आधार पर बनाई जाती हैं। यह मिथ्या अहंकार प्रभु के साथ एक होने की सीमा तक फैला हुआ है। अहंकारी वातानुकूलित आत्माओं के अंतिम वर्ग - अज्ञानता के गुण में - शरीर के साथ स्वयं की पहचान द्वारा गुमराह किए जाते हैं। इस प्रकार उनकी सभी गतिविधियाँ केवल शरीर के इर्द-गिर्द केंद्रित होती हैं। इन सभी व्यक्तियों को मिथ्या अहंकारी विचारों के साथ खेलने का मौका दिया जाता है, लेकिन साथ ही प्रभु उन्हें भगवद्-गीता और श्रीमद्-भागवतम जैसे शास्त्रों से मदद लेने का मौका देने के लिए पर्याप्त दयालु हैं ताकि वे कृष्ण के विज्ञान को समझ सकें और इस प्रकार अपने जीवन को सफल बना सकें। इसलिए, संपूर्ण भौतिक सृजन भौतिक प्रकृति के तरीकों में अलग-अलग भ्रम में मानसिक स्तर पर मंडराने वाली झूठी अहंकारी जीवित संस्थाओं के लिए है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥