श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.5.28 
सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्‍दृष्टिगोचर: ।
आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात महत् तत्व ने भविष्य में आने वाले अनेक जीवों के भंडारों के रूप में स्वयं को कई अलग-अलग स्वरूपों में विभाजित कर लिया। महत् तत्व मुख्यतः अज्ञान के गुण में होता है और यह झूठे अहंकार उत्पन्न करता है। यह भगवान का पूर्ण अंश है, जो रचनात्मक सिद्धांतों एवं फल प्राप्ति के समय की पूर्ण चेतना से युक्त होता है।
 
Thereafter the vital element differentiated into the reservoir forms of many different future living beings. This important element is mainly Tamoguni and it gives rise to false ego. This is the breath of God, which is full of consciousness and functioning of the creative principles.
तात्पर्य
महात्तत्व शुद्ध आत्मा और भौतिक अस्तित्व के बीच का माध्यम है। यह पदार्थ और आत्मा का मिलन बिंदु है जहाँ से जीवित प्राणी का मिथ्या अहंकार उत्पन्न होता है। सभी जीवित प्राणी ईश्वर व्यक्तित्व के विभेदित भाग और उपभाग हैं। मिथ्या अहंकार के दबाव में, सशर्त आत्माएँ, यद्यपि ईश्वर सर्वोच्च व्यक्तित्व के भाग और उपभाग हैं, भौतिक प्रकृति के भोगी होने का दावा करते हैं। यह मिथ्या अहंकार ही भौतिक अस्तित्व की बाध्य शक्ति है। भगवान बार-बार भ्रमित सशर्त आत्माओं को इस मिथ्या अहंकार से मुक्त होने का मौका देते हैं, और यही कारण है कि भौतिक सृजन अंतराल पर होता है। वह सशर्त आत्माओं को मिथ्या अहंकार की गतिविधियों को ठीक करने के लिए सभी सुविधाएँ देते हैं, लेकिन वह भाग और उपभाग के रूप में उनकी छोटी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)