श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.5.27 
ततोऽभवन् महत्तत्त्वमव्यक्तात्कालचोदितात् ।
विज्ञानात्मात्मदेहस्थं विश्वं व्यञ्जंस्तमोनुद: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, अनन्तकाल के अन्तःक्रियाओं से प्रभावित पदार्थ का परम सार, जिसे महत्-तत्त्व कहा जाता है, प्रकट हुआ, और इस महत्-तत्त्व में शुद्ध सत्त्व, सर्वोच्च स्वामी ने अपने शरीर से ब्रह्मांड अभिव्यक्ति के बीज बोए।
 
Thereafter, the ultimate essence of matter affected by the interactions of daily time, which is called Mahat Tattva, appeared and in this Mahat Tattva, pure Sattva i.e. God sowed the seeds of cosmic manifestation from His body.
तात्पर्य
समय बीतने पर, गर्भवती भौतिक ऊर्जा सर्वप्रथम समस्त भौतिक सामग्रियों के रूप में प्रकट हुई। सब चीजों के फलित होने में समय लगता है, और इसलिए यहाँ काल-कोडित्त, "समय से प्रभावित," शब्द का उपयोग किया गया है। महत-तत्त्व सम्पूर्ण चेतना है क्योंकि इसका एक अंश प्रत्येक व्यक्ति में बुद्धि के रूप में निहित होता है। महत-तत्त्व का सर्वोच्च स्थिति के परम चेतना से सीधा संबंध है, फिर भी यह पदार्थ के रूप में प्रतीत होता है। महत-तत्त्व, या शुद्ध चेतना की छाया, सृष्टि का अंकुर स्थल है। यह एक अल्प मात्रा में भौतिक काम गुण के साथ शुद्ध अच्छाई है, और इसलिए इस बिंदु से क्रियाशीलता उत्पन्न होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)