श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.5.26 
कालवृत्त्या तु मायायां गुणमय्यामधोक्षज: ।
पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त वीर्यवान् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
अपने पूर्ण विस्तार, दिव्य पुरुष अवतार के रूप में परमेश्वर, तीनों गुणों वाली भौतिक प्रकृति (प्रकृति) में बीज बोते हैं, और इस तरह अनंत काल के प्रभाव से जीव प्रकट होते हैं।
 
The Supreme Being in His own divine male incarnation establishes the seed in the three modes of nature and thus all beings come into being by the influence of eternal time.
तात्पर्य
किसी भी जीव की संतान उसके पिता द्वारा माँ को वीर्य से गर्भाधान करने के बाद पैदा होती है, और पिता के वीर्य में तैर रहे जीव की आकृति माँ के रूप की हो जाती है। इसी तरह, माँ प्रकृति अपने भौतिक तत्वों से किसी भी जीव को तब तक पैदा नहीं कर सकती जब तक कि खुद भगवान उसे जीवित प्राणियों से गर्भाधान नहीं कराते। जीवों की उत्पत्ति का यही रहस्य है। यह गर्भाधान प्रक्रिया पहले पुरुष अवतार, कारणार्णवशायी विष्णु द्वारा की जाती है। बस उनकी नजर प्रकृति के ऊपर पड़ने से ही पूरा काम हो जाता है।

हमें ईश्वर के व्यक्तित्व द्वारा गर्भाधान की प्रक्रिया को हमारे यौनाचार की धारणा के संदर्भ में नहीं समझना चाहिए। सर्वशक्तिमान भगवान सिर्फ अपनी आँखों से ही गर्भाधान कर सकते हैं, और इसलिए उन्हें सर्वशक्तिमान कहा जाता है। उनके अलौकिक शरीर का प्रत्येक भाग अन्य भागों का प्रत्येक कार्य कर सकता है। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता (5.32) में की गई है: अंगनि यस्य सकलेंद्रिय-वृत्तिमांति। भगवद-गीता (14.3) में भी, इसी सिद्धांत की पुष्टि की गई है: माम योनि महद ब्रह्म तस्मिन गर्भं दधाम्य अहम्। जब ब्रह्मांडीय सृष्टि प्रकट होती है, जीवित प्राणियों को सीधे भगवान से आपूर्ति की जाती है; वे कभी भी भौतिक प्रकृति के उत्पाद नहीं होते हैं। इस प्रकार, भौतिक विज्ञान की कोई भी वैज्ञानिक उन्नति कभी भी जीवित प्राणी उत्पन्न नहीं कर सकती। यही भौतिक सृष्टि का पूरा रहस्य है। जीवित प्राणी पदार्थ के पराए हैं, और इस प्रकार वे तब तक खुश नहीं हो सकते जब तक वे भगवान जैसे ही आध्यात्मिक जीवन में स्थित नहीं हो जाते। जीवन की इस मूल स्थिति को भूलकर, गलत जीवित प्राणी अनावश्यक रूप से भौतिक दुनिया में खुश होने की कोशिश करने में समय बर्बाद करते हैं। पूरी वैदिक प्रक्रिया उसी जीवन की इस आवश्यक विशेषता की याद दिलाती है। भगवान सशर्त आत्मा को अपने तथाकथित आनंद के लिए एक भौतिक शरीर प्रदान करते हैं, लेकिन यदि कोई अपनी इंद्रियों में नहीं आता है और आध्यात्मिक चेतना में प्रवेश नहीं करता है, तो भगवान फिर से उसे निर्विवाद स्थिति में डाल देते हैं जैसा कि सृष्टि की शुरुआत में था। प्रभु का वर्णन यहाँ वीर्यवान या सबसे शक्तिशाली प्राणी के रूप में किया गया है, क्योंकि उन्होंने भौतिक प्रकृति को असंख्य जीवित प्राणियों से गर्भित किया है जो अनादि काल से वातानुकूलित हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)