हमें ईश्वर के व्यक्तित्व द्वारा गर्भाधान की प्रक्रिया को हमारे यौनाचार की धारणा के संदर्भ में नहीं समझना चाहिए। सर्वशक्तिमान भगवान सिर्फ अपनी आँखों से ही गर्भाधान कर सकते हैं, और इसलिए उन्हें सर्वशक्तिमान कहा जाता है। उनके अलौकिक शरीर का प्रत्येक भाग अन्य भागों का प्रत्येक कार्य कर सकता है। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता (5.32) में की गई है: अंगनि यस्य सकलेंद्रिय-वृत्तिमांति। भगवद-गीता (14.3) में भी, इसी सिद्धांत की पुष्टि की गई है: माम योनि महद ब्रह्म तस्मिन गर्भं दधाम्य अहम्। जब ब्रह्मांडीय सृष्टि प्रकट होती है, जीवित प्राणियों को सीधे भगवान से आपूर्ति की जाती है; वे कभी भी भौतिक प्रकृति के उत्पाद नहीं होते हैं। इस प्रकार, भौतिक विज्ञान की कोई भी वैज्ञानिक उन्नति कभी भी जीवित प्राणी उत्पन्न नहीं कर सकती। यही भौतिक सृष्टि का पूरा रहस्य है। जीवित प्राणी पदार्थ के पराए हैं, और इस प्रकार वे तब तक खुश नहीं हो सकते जब तक वे भगवान जैसे ही आध्यात्मिक जीवन में स्थित नहीं हो जाते। जीवन की इस मूल स्थिति को भूलकर, गलत जीवित प्राणी अनावश्यक रूप से भौतिक दुनिया में खुश होने की कोशिश करने में समय बर्बाद करते हैं। पूरी वैदिक प्रक्रिया उसी जीवन की इस आवश्यक विशेषता की याद दिलाती है। भगवान सशर्त आत्मा को अपने तथाकथित आनंद के लिए एक भौतिक शरीर प्रदान करते हैं, लेकिन यदि कोई अपनी इंद्रियों में नहीं आता है और आध्यात्मिक चेतना में प्रवेश नहीं करता है, तो भगवान फिर से उसे निर्विवाद स्थिति में डाल देते हैं जैसा कि सृष्टि की शुरुआत में था। प्रभु का वर्णन यहाँ वीर्यवान या सबसे शक्तिशाली प्राणी के रूप में किया गया है, क्योंकि उन्होंने भौतिक प्रकृति को असंख्य जीवित प्राणियों से गर्भित किया है जो अनादि काल से वातानुकूलित हैं।
