हे ऋषियों, जो लोग अपने दुष्कर्मों के कारण दिव्य कथा-प्रसंगों से विमुख रहते हैं और भगवद्गीता के उद्देश्य से वंचित हो गये हैं, वे दयनीय द्वारा भी दया के पात्र हैं। मैं भी उन पर तरस करता हूँ, क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि कैसे अनंतकाल द्वारा उनकी आयु व्यर्थ हो रही है। वे दार्शनिक विचार, जीवन के सैद्धांतिक चरम लक्ष्यों और विभिन्न अनुष्ठानों की प्रथाओं को अपनाये हुए हैं।
O sage, those who, due to their sinful acts, remain aloof from the divine episodes and are consequently deprived of the purpose of the Mahabharata (Bhagavadgita), are worthy of pity even by the pitiable. I too feel pity for them, because I see how their life is being wasted by timelessness. They keep themselves occupied in philosophical contemplation, theoretical ultimate goals of life and in presenting the methods of various rituals.
तात्पर्य
भौतिक प्रकृति की मर्यादा में, मानव और परमेश्वर के बीच तीन तरह के संबंध है। जो लोग अज्ञानी और काम भावना से युक्त है वे ईश्वर के होने से घृणा करते है या फिर वे औपचारिक तौर पर ईश्वर के होने को मानते है जिन्हें मानने वाले हमेशा उनकी मांगों को पूरा करना चाहते है। उनके बाद वे लोग आते है जो भलमनसाहत से युक्त होते है। इस दूसरे श्रेणी के लोग परमेश्वर को निराकार मानते है। वे भक्ति के पंथ को स्वीकार करते है, जिसमें सबसे पहले कृष्ण कथा का श्रवण करना शामिल होता है, ताकि वे भक्ति के मार्ग पर चल पाएं। उन सबसे ऊपर वे लोग है जो पूर्ण रूप से भक्त हैं। वे इस भौतिक अच्छाई से परे होकर एक अलौकिक मुकाम पर विराजमान होते है। ऐसे लोग निश्चय ही इस बात से सहमत होते है कि परमेश्वर का नाम, रूप, प्रसिद्धि, गुण आदि एक दूसरे से कुछ अलग नहीं है। उनके लिए कृष्ण कथा के विषयों का श्रवण करना बिलकुल वैसा ही है जैसे उनके सामने खड़े होकर उनसे मिलना। इस श्रेणी के लोगों के अनुसार, जो ईश्वर के प्रति भक्ति से युक्त होते है, मानव जीवन का सबसे ऊपर का लक्ष्य पुरुषार्थ होता है। अर्थात ईश्वर की भक्ति करना ही जीवन का असली उद्देश्य होना चाहिए। निराकारवादी क्योंकि वे अपने मानसिक दृष्टिकोण से विचार करते है और उनका परमेश्वर के प्रति का कोई विश्वास नहीं है और जिनका कृष्ण कथा के विषयों में कोई विश्वास नहीं है। ऐसे लोग परमेश्वर के उस प्रथम श्रेणी के भक्तों के लिए दया के पात्र है। दयनीय निराकारवादी उन लोगों पर दया करते है जो अज्ञानता और कामना के मोड में है, लेकिन परमेश्वर के प्रति समर्पित शुद्ध भक्त उन दोनों पर दया करते है क्योंकि दोनों ही मानव जीवन को झूठे लक्ष्यों जैसे इंद्रिय भोग, मानसिक अनुमान और विभिन्न सिद्धांतों द्वारा जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में व्यर्थ करते है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥