विदुर ने मैत्रेय को सांसारिक सामाजिक और राजनीतिक विषयों के ज्ञान से पूरी तरह से तृप्त होने और अब उनमें कोई दिलचस्पी न होने की अपनी स्थिति के बारे में बताया। वह भगवान श्री कृष्ण के बारे में पारलौकिक विषयों को सुनने के लिए उत्सुक थे। चूंकि पुराणों, महाभारत आदि में कृष्ण से सीधे संबंधित विषय अपर्याप्त थे, इसलिए वह संतुष्ट नहीं थे और कृष्ण के बारे में अधिक जानना चाहते थे। कृष्ण-कथा, या कृष्ण के बारे में विषय, पारलौकिक हैं, और ऐसे विषयों को सुनने में कोई तृप्ति नहीं होती है। भगवद-गीता का महत्व कृष्ण-कथा होने के कारण है, या भगवान कृष्ण द्वारा दिए गए भाषण। कुरुक्षेत्र के युद्ध की कहानी लोगों के बड़े समुदाय के लिए दिलचस्प हो सकती है, लेकिन विदुर जैसे व्यक्ति के लिए, जो भक्ति सेवा में अत्यधिक उन्नत है, केवल कृष्ण-कथा और जो कृष्ण-कथा के साथ जुड़ा हुआ है, दिलचस्प है। विदुर मैत्रेय से हर चीज के बारे में सुनना चाहते थे, और इसलिए उन्होंने उनसे पूछताछ की, लेकिन उनकी इच्छा थी कि सभी विषय कृष्ण के साथ संबंध में हों। जैसे आग जलाऊ लकड़ी के सेवन से कभी संतुष्ट नहीं होती, वैसे ही प्रभु का शुद्ध भक्त कृष्ण के बारे में कभी भी पर्याप्त नहीं सुनता है। सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं से संबंधित ऐतिहासिक घटनाएँ और अन्य वर्णन सभी पारलौकिक बन जाते हैं जैसे ही उनका कृष्ण से संबंध होता है। सांसारिक चीजों को आध्यात्मिक पहचान में बदलने का यही तरीका है। यदि सभी सांसारिक गतिविधियों को कृष्ण-कथा के साथ जोड़ दिया जाए तो पूरी दुनिया को वैकुंठ में बदला जा सकता है।
दुनिया में दो महत्वपूर्ण कृष्ण-कथाएँ प्रचलित हैं - भगवद-गीता और श्रीमद्-भागवतम। भगवद-गीता कृष्ण-कथा है क्योंकि यह कृष्ण द्वारा बोली गई है, जबकि श्रीमद्-भागवतम कृष्ण-कथा है क्योंकि यह कृष्ण के बारे में वर्णन करता है। भगवान चैतन्य ने अपने सभी शिष्यों को बिना किसी भेदभाव के पूरी दुनिया में कृष्ण-कथा का प्रचार करने की सलाह दी क्योंकि कृष्ण-कथा का पारलौकिक मूल्य सभी को भौतिक संदूषण से शुद्ध कर सकता है।
