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श्लोक 3.5.10  |
परावरेषां भगवन् व्रतानि
श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् ।
अतृप्नुम क्षुल्लसुखावहानां
तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ १० ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु, मैंने मानव समाज के उच्च और निम्न स्तरों के विषय में व्यासदेव के मुख से बार-बार सुना है और मैं इन तुच्छ विषयों और उनके सुखों से पूरी तरह संतुष्ट हूँ। पर वे विषय बिना कृष्ण कथाओं से मिले अमृत के मुझे तृप्त नहीं कर सके। |
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| हे प्रभु, मैंने मानव समाज के उच्च और निम्न स्तरों के विषय में व्यासदेव के मुख से बार-बार सुना है और मैं इन तुच्छ विषयों और उनके सुखों से पूरी तरह संतुष्ट हूँ। पर वे विषय बिना कृष्ण कथाओं से मिले अमृत के मुझे तृप्त नहीं कर सके। |
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