श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.5.1 
श्री शुक उवाच
द्वारि द्युनद्या ऋषभ: कुरूणां
मैत्रेयमासीनमगाधबोधम् ।
क्षत्तोपसृत्याच्युतभावसिद्ध:
पप्रच्छ सौशील्यगुणाभितृप्त: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी कहते हैं : इस प्रकार कुरुवंश में सर्वश्रेष्ठ विदुर, जो कि भगवद्भक्ति में पूर्ण थे, स्वर्ग लोक की नदी गंगा के उद्गम (हरद्वार) पहुँचे, जहाँ विश्व के अगाध विद्वान महामुनि मैत्रेय विराजमान थे। सौम्यता में पूर्ण एवं अध्यात्म में संतुष्ट विदुर ने उनसे पूछा।
 
Sukadeva Goswami said: Thus, Vidura, the best of the Kuru clan, who was full of devotion towards God, reached the source of the river Ganga (Hardwar) of heaven where the great sage Maitreya, the most learned man in the world, was residing. Vidura, who was full of humility and satisfied with spirituality, asked him.
तात्पर्य
अपनी अप्राकृत भक्ति से विदुर पहले ही पूर्ण बन चुके थे। भगवान और अन्य जीवात्माएँ स्वाभाव से गुणात्मक रूप से एक जैसे हैं, पर भगवान सभी अन्य जीवात्माओं से मात्रात्मक रूप से ज्यादा है। वे हमेशा ही अप्राकृत होते हैं, जबकि अन्य जीव भ्रामक ऊर्जा के अंतर्गत आते हैं। विदुर पहले ही अपने अच्युत-भाव, या भगवान की भक्ति में खो जाने के कारण साँसारिक जीवों के दोषपूर्ण स्वभाव से परे चले गये थे। जीवन के इस स्तर को अच्युत-भाव-सिद्ध, या भक्ति सेवा के कारण पूर्णता कहते हैं। इसलिए जो कोई भी भगवान की भक्ति सेवा में खो जाता है वह एक मुक्त आत्मा है और उसमें सारे प्रशंसनीय गुण होते हैं। प्रकांड विद्वान मंत्री हार्डवर में गंगा तट पर एकांत स्थान पर बैठे थे, और विदुर, जो भगवान के परिपूर्ण भक्त थे और सारे अध्यात्मिक गुणों से संपन्न थे, उनके पास पूछताछ के लिए पहुँचे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)