श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.4.6 
अद्राक्षमेकमासीनं विचिन्वन् दयितं पतिम् ।
श्रीनिकेतं सरस्वत्यां कृतकेतमकेतनम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, मैंने देखा कि मेरे आराध्य और स्वामी [भगवान श्रीकृष्ण] सरस्वती नदी के तट पर अकेले बैठे थे और गहन चिन्तन कर रहे थे, हालाँकि वे स्वयं देवी लक्ष्मी के आश्रयदाता हैं।
 
While following Him in this manner, I saw my protector and master (Lord Sri Krishna) taking shelter on the bank of the river Sarasvati, sitting alone and deep in thought, although He is the shelter of the Goddess Lakshmi.
तात्पर्य
जो लोग त्यागी आश्रम में होते हैं वे अक्सर किसी वृक्ष की शरण ग्रहण करते हैं। उद्धव ने भगवान को ऐसे ही निराश्रित व्यक्ति की तरह शरण लेते हुए पाया था। चूँकि वे ही सर्वस्व के स्वामी हैं, इसलिए हर जगह उनकी शरण है, और हर जगह उनकी शरण में है। समस्त भौतिक और आध्यात्मिक ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति उन्हीं द्वारा कायम है, और इसलिए वे हर चीज़ की शरण हैं। इसलिए त्यागी आश्रम वालों की तरह निराश्रित व्यक्ति के तौर पर शरण ग्रहण करना उनके लिए आश्चर्यजनक नहीं था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)