श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.4.35 
आत्मानं च कुरुश्रेष्ठ कृष्णेन मनसेक्षितम् ।
ध्यायन् गते भागवते रुरोद प्रेमविह्वल: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
यह समझते हुए कि (संसार का त्याग करते समय) भगवान् कृष्ण ने उन्हें याद किया था, विदुर प्रेम रस से अभिभूत होकर ऊंचे स्वर से विलाप करने लगे।
 
Hearing that Lord Krishna had remembered him (while leaving this world), Vidur was overwhelmed with love and started crying loudly.
तात्पर्य
अंतिम क्षण में परम भगवान् श्री कृष्ण के बारे में सोचते हुए विदुर को प्रेम की परमानंदातिरेकता से अभिभूत हो गए थे। यद्यपि वे स्वयं को नगण्य समझते थे, लेकिन प्रभु ने अपनी अकारण दया से उन्हें याद किया था। विदुर ने इसे एक महान उपकार माना और इस प्रकार वे रो पड़े। भक्ति सेवा की प्रगतिशील साधना में यही रोना अंतिम शब्द है। जो प्रेम में प्रभु के लिए रो सकता है, वह निश्चित रूप से भक्ति सेवा की पंक्ति में सफल होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)