ब्रह्म-संहिता के अनुसार, भगवान के कई रूप हैं। इसमें कहा गया है कि भगवान के असंख्य रूप हैं, और जब वह जीवित संस्थाओं की दृष्टि में प्रकट होते हैं, जैसे भगवान कृष्ण वास्तव में प्रकट हुए, तो ऐसे सभी रूप उनसे मिल जाते हैं। इन सभी अचूक रूपों के अलावा, उनका अपना सार्वभौमिक रूप है, जैसा कि कुरुक्षेत्र की लड़ाई में अर्जुन के सामने प्रकट हुआ था। यहाँ इस श्लोक में sphītam शब्द का भी उपयोग किया गया है, जो इंगित करता है कि उन्होंने अपना विशाल विश्व रूप छोड़ दिया जिसे विराट-रूप कहा जाता है, न कि उनका प्रधान, शाश्वत रूप, क्योंकि उनके सच्चिदानंद के रूप को बदलने की संभावना शायद ही कोई हो। यह सरल समझ भगवान के भक्तों द्वारा तुरंत महसूस की जाती है, लेकिन जो अनीश्वरवादी हैं, जो भगवान के लिए शायद ही कोई भक्ति सेवा करते हैं, वे या तो इस सरल तथ्य को नहीं समझते हैं या जानबूझकर भगवान के अलौकिक शरीर की अनंतता को हराने के लिए विवाद खड़ा करते हैं । यह अपूर्ण जीवों की धोखा देने की प्रवृत्ति नामक दोष के कारण है।
व्यावहारिक अनुभव से भी, यह देखा जाता है कि वर्तमान समय तक, भगवान के पारलौकिक रूप की पूजा विभिन्न मंदिरों में भक्तों द्वारा की जाती है, और भगवान के सभी भक्त वास्तव में महसूस करते हैं कि मंदिर में देवता का रूप भगवान के रूप से भिन्न नहीं है। भगवान की आंतरिक शक्ति के इस अकल्पनीय प्रदर्शन का वर्णन भगवद-गीता (7.25) में किया गया है: नाहाम् प्रकाश: सर्वस्य योग-माया-समावृता। भगवान हर किसी के द्वारा उजागर न होने का अधिकार सुरक्षित रखता है। पद्म पुराण में कहा गया है, अतः श्री-कृष्ण-नामादि न भवेद ग्रह्यम इन्द्रियैः। भगवान के नाम और रूप को भौतिक इंद्रियों द्वारा नहीं माना जा सकता है, लेकिन जब वह सांसारिक लोगों की दृष्टि में प्रकट होते हैं तो वह विराट-रूप धारण करते हैं। यह रूप और प्रदर्शन की एक अतिरिक्त भौतिक प्रदर्शनी है और एक विषय और उसके विशेषणों के तर्क द्वारा समर्थित है। व्याकरण में, जब किसी विषय से विशेषण हटा दिया जाता है, तो जो विषय इसे संशोधित करता है वह नहीं बदलता है। इसी तरह, जब भगवान अपने विराट-रूप को छोड़ते हैं, तो उनका शाश्वत रूप नहीं बदलता है, यद्यपि स्वयं और उनके असंख्य रूपों में से किसी एक के बीच कोई भौतिक अंतर नहीं है। पाँचवें छंद में यह देखा जाएगा कि कैसे भगवान को विभिन्न रूपों में विभिन्न ग्रहों में पूजा जाता है, अब भी, और कैसे वे इस पृथ्वी के विभिन्न मंदिरों में भी पूजा जाते हैं।
श्रीला जीव गोस्वामी और श्रील विष्णुनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने विभिन्न प्रामाणिक वैदिक साहित्यों का हवाला देते हुए अपनी टिप्पणियों में भगवान के गायब होने की इस घटना को बहुत विस्तृत रूप से समझाया है। हम इस पुस्तक के आयतन में वृद्धि से बचने के लिए उन सभी को उद्देश्यपूर्ण रूप से शामिल नहीं करते हैं। भगवद-गीता में पूरे मामले को समझाया गया है, जैसा कि ऊपर उद्धृत किया गया है: भगवान सभी को उजागर नहीं होने का अधिकार सुरक्षित रखता है। वह हमेशा खुद को अनीश्वरियों की दृष्टि से दूर रखता है, जो प्रेम और भक्ति से रहित हैं, और इस प्रकार वह उन्हें भगवान से और भी दूर कर देता है। भगवान ब्रह्मा के निमंत्रण पर प्रकट हुए, जिन्होंने क्षीरदकशायी विष्णु के सामने प्रार्थना की, और इसलिए जब भगवान प्रकट हुए, तो विष्णु के सभी रूप उनसे मिल गए, और जब मिशन पूरा हुआ, तो उन सभी ने हमेशा की तरह उनसे अलग हो गए।
