श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.4.21 
सोऽहं तद्दर्शनाह्लादवियोगार्तियुत: प्रभो ।
गमिष्ये दयितं तस्य बदर्याश्रममण्डलम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय विदुर, अब मैं उन्हें देखने के मिलने वाले सुख के अभाव में पागल हो रहा हूँ और इसे कम करने के लिए ही मैं अब हिमालय स्थित बदरिकाश्रम जा रहा हूँ, जैसा कि उन्होंने मुझे आदेश दिया है।
 
प्रिय विदुर, अब मैं उन्हें देखने के मिलने वाले सुख के अभाव में पागल हो रहा हूँ और इसे कम करने के लिए ही मैं अब हिमालय स्थित बदरिकाश्रम जा रहा हूँ, जैसा कि उन्होंने मुझे आदेश दिया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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