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श्लोक 3.4.2  |
तेषां मैरेयदोषेण विषमीकृतचेतसाम् ।
निम्लोचति रवावासीद्वेणूनामिव मर्दनम् ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे बाँस आपस में रगड़ खाने से नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही सूर्यास्त के समय नशे के कारण पैदा होने वाले दोषों के कारण उनके मन असंतुलित हो गए और उनका विनाश हो गया। |
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| जैसे बाँस आपस में रगड़ खाने से नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही सूर्यास्त के समय नशे के कारण पैदा होने वाले दोषों के कारण उनके मन असंतुलित हो गए और उनका विनाश हो गया। |
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