भगवान के व्यक्तित्व और अवैयक्तिक ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है। तो भगवान के इतने काम कैसे हो सकते हैं, जबकि अवैयक्तिक ब्रह्म के बारे में कहा जाता है कि भौतिक या आध्यात्मिक रूप से भी उसका कोई काम नहीं होता? अगर भगवान अजन्मा हैं, तो वे वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कैसे जन्मे? वे काल से भी भयभीत हैं, जो सर्वोच्च भय है, और फिर भी भगवान जरासंध से युद्ध करने से डरते हैं और किले में शरण लेते हैं। जो अपने आप में पूर्ण है, वो कई स्त्रियों के साथ संगति का आनंद कैसे ले सकता है? वो पत्नियाँ कैसे ले सकते हैं और परिवार के सदस्यों, बच्चों, रिश्तेदारों और माता-पिता की संगति का आनंद लेने वाले गृहस्थ की तरह कैसे हो सकते हैं? ये सभी सभी विरोधाभासी घटनाएँ महानतम विद्वानों को भी हैरान कर देती हैं, जो इस तरह भ्रमित होकर समझ नहीं पाते हैं कि निष्क्रियता एक तथ्य है या क्या उनकी गतिविधियाँ केवल नकली हैं।
समाधान यह है कि भगवान का सांसारिक चीज़ों से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी सभी गतिविधियाँ दिव्य हैं। यह सांसारिक सट्टेबाजों द्वारा समझा नहीं जा सकता है। सांसारिक सट्टेबाजों के लिए निश्चित रूप से एक प्रकार का भ्रम है, लेकिन दिव्य भक्तों के लिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पूर्ण सत्य की ब्रह्म अवधारणा निश्चित रूप से सभी सांसारिक गतिविधियों का निषेध है, लेकिन परब्रह्म अवधारणा दिव्य गतिविधियों से पूर्ण है। जो व्यक्ति ब्रह्म की अवधारणा और परम ब्रह्म की अवधारणा के बीच के अंतर को जानता है, निश्चित रूप से वास्तविक दिव्यज्ञानी है। ऐसे दिव्यज्ञानी के लिए कोई भ्रम नहीं है। स्वयं भगवान ने भी भागवद गीता (10.2) में घोषणा की है, "यहां तक कि महान ऋषि और देवता भी मेरे कार्यों और दिव्य क्षमताओं के बारे में शायद ही कुछ जान पाते हैं।" भगवान की गतिविधियों की सही व्याख्या दादा भीष्मदेव (भागवत 1.9.16) द्वारा इस प्रकार दी गई है:
ना हि अस्य करहिचित् राजन्
पुमान वेद विधिस्थितम्
यद् विज्ञायसाय युक्ता
मुह्यन्ति कवयोऽपि हि
