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श्लोक 3.4.16  |
कर्माण्यनीहस्य भवोऽभवस्य ते
दुर्गाश्रयोऽथारिभयात्पलायनम् ।
कालात्मनो यत्प्रमदायुताश्रम:
स्वात्मन्रते: खिद्यति धीर्विदामिह ॥ १६ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु, विद्वान मुनियों की बुद्धि भी विचलित हो जाती है जब वे देखते हैं कि आप समस्त इच्छाओं से मुक्त होते हुए भी सकाम कर्म में लगे हुए हैं। आप अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, अजेय काल के नियन्ता होते हुए भी शत्रुभय से पलायन करके दुर्ग में शरण लेते हैं और अपनी आत्मा में रमण करते हुए भी आप अनेक स्त्रियों से घिरे रहकर गृहस्थ जीवन का आनन्द लेते हैं। |
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| हे प्रभु, विद्वान मुनियों की बुद्धि भी विचलित हो जाती है जब वे देखते हैं कि आप समस्त इच्छाओं से मुक्त होते हुए भी सकाम कर्म में लगे हुए हैं। आप अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, अजेय काल के नियन्ता होते हुए भी शत्रुभय से पलायन करके दुर्ग में शरण लेते हैं और अपनी आत्मा में रमण करते हुए भी आप अनेक स्त्रियों से घिरे रहकर गृहस्थ जीवन का आनन्द लेते हैं। |
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