श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.4.16 
कर्माण्यनीहस्य भवोऽभवस्य ते
दुर्गाश्रयोऽथारिभयात्पलायनम् ।
कालात्मनो यत्प्रमदायुताश्रम:
स्वात्मन्रते: खिद्यति धीर्विदामिह ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, विद्वान मुनियों की बुद्धि भी विचलित हो जाती है जब वे देखते हैं कि आप समस्त इच्छाओं से मुक्त होते हुए भी सकाम कर्म में लगे हुए हैं। आप अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, अजेय काल के नियन्ता होते हुए भी शत्रुभय से पलायन करके दुर्ग में शरण लेते हैं और अपनी आत्मा में रमण करते हुए भी आप अनेक स्त्रियों से घिरे रहकर गृहस्थ जीवन का आनन्द लेते हैं।
 
O Lord, even the learned sages' intellects are perturbed when they see that You, despite being free from all desires, engage in fruitive activities; that You, despite being unborn, take birth; that You, despite being the invincible controller of time, flee from fear of enemies and take refuge in a fort; and that You, despite being absorbed in Your own soul, enjoy the life of a householder surrounded by many women.
तात्पर्य
भगवान के शुद्ध भक्त भगवान के दिव्य ज्ञान के संबंध में दार्शनिक अटकलों से बहुत अधिक सम्बन्धित नहीं होते हैं। भगवान का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना सम्भव भी नहीं है। भगवान के बारे में उनका जो थोड़ा बहुत ज्ञान है वो उनके लिए पर्याप्त है क्योंकि भक्त केवल भगवान के दिव्य पाश्चर्यकर्मों के बारे में सुनकर और उनका जाप करके संतुष्ट हो जाते हैं। इससे उन्हें सभी दिव्य आनन्द प्राप्त होते हैं। लेकिन भगवान के कुछ पाश्चर्यकर्म, ऐसे शुद्ध भक्तों को भी विरोधाभासी दिखाई देते हैं, और इस तरह उद्धव ने भगवान से उनके पाश्चर्यकर्मों में से कुछ विरोधाभासी घटनाओं के बारे में पूछा। भगवान का वर्णन कुछ भी व्यक्तिगत रूप से न करने वाला किया गया है, और यह वास्तव में इसलिए है क्योंकि भौतिक संसार के निर्माण और जीविका में भी, भगवान का कुछ भी काम नहीं होता है। तब, यह सुनने में विरोधाभासी प्रतीत होता है कि भगवान ने व्यक्तिगत रूप से अपने अविरल भक्तों की सुरक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठाया। भगवान परम ब्रह्म है, पूर्ण सत्य है, भगवान का व्यक्तित्व, जो मानव की तरह दिखाई देता है, लेकिन उद्धव को संदेह था कि क्या उनके इतने सारे दिव्य कार्य हो सकते हैं।

भगवान के व्यक्तित्व और अवैयक्तिक ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है। तो भगवान के इतने काम कैसे हो सकते हैं, जबकि अवैयक्तिक ब्रह्म के बारे में कहा जाता है कि भौतिक या आध्यात्मिक रूप से भी उसका कोई काम नहीं होता? अगर भगवान अजन्मा हैं, तो वे वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कैसे जन्मे? वे काल से भी भयभीत हैं, जो सर्वोच्च भय है, और फिर भी भगवान जरासंध से युद्ध करने से डरते हैं और किले में शरण लेते हैं। जो अपने आप में पूर्ण है, वो कई स्त्रियों के साथ संगति का आनंद कैसे ले सकता है? वो पत्नियाँ कैसे ले सकते हैं और परिवार के सदस्यों, बच्चों, रिश्तेदारों और माता-पिता की संगति का आनंद लेने वाले गृहस्थ की तरह कैसे हो सकते हैं? ये सभी सभी विरोधाभासी घटनाएँ महानतम विद्वानों को भी हैरान कर देती हैं, जो इस तरह भ्रमित होकर समझ नहीं पाते हैं कि निष्क्रियता एक तथ्य है या क्या उनकी गतिविधियाँ केवल नकली हैं।

समाधान यह है कि भगवान का सांसारिक चीज़ों से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी सभी गतिविधियाँ दिव्य हैं। यह सांसारिक सट्टेबाजों द्वारा समझा नहीं जा सकता है। सांसारिक सट्टेबाजों के लिए निश्चित रूप से एक प्रकार का भ्रम है, लेकिन दिव्य भक्तों के लिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पूर्ण सत्य की ब्रह्म अवधारणा निश्चित रूप से सभी सांसारिक गतिविधियों का निषेध है, लेकिन परब्रह्म अवधारणा दिव्य गतिविधियों से पूर्ण है। जो व्यक्ति ब्रह्म की अवधारणा और परम ब्रह्म की अवधारणा के बीच के अंतर को जानता है, निश्चित रूप से वास्तविक दिव्यज्ञानी है। ऐसे दिव्यज्ञानी के लिए कोई भ्रम नहीं है। स्वयं भगवान ने भी भागवद गीता (10.2) में घोषणा की है, "यहां तक कि महान ऋषि और देवता भी मेरे कार्यों और दिव्य क्षमताओं के बारे में शायद ही कुछ जान पाते हैं।" भगवान की गतिविधियों की सही व्याख्या दादा भीष्मदेव (भागवत 1.9.16) द्वारा इस प्रकार दी गई है:

ना हि अस्य करहिचित् राजन्

पुमान वेद विधिस्थितम्

यद् विज्ञायसाय युक्ता

मुह्यन्ति कवयोऽपि हि

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)