पुरा मया प्रोक्तमजाय नाभ्ये
पद्मे निषण्णाय ममादिसर्गे ।
ज्ञानं परं मन्महिमावभासं
यत्सूरयो भागवतं वदन्ति ॥ १३ ॥
अनुवाद
हे उद्धव, पुराने समय में कमल कल्प में, सृष्टि के प्रारंभ में, मैंने अपनी नाभि से निकले कमल पर बैठे ब्रह्मा से अपनी दिव्य महिमाओं के बारे में बात की, जिसे महान ऋषि श्रीमद्-भागवत कहते हैं।
O Uddhava, in ancient times, in the Kamal Kalpa, at the beginning of creation, I told Brahma, who was sitting on the lotus growing from my navel, about my divine glories, which the great sages call Srimad Bhagavatam.
तात्पर्य
ब्रह्माजी को बताए गए परम आत्मा के स्पष्टीकरण को इस महान साहित्य के दूसरे कांड में पहले ही समझाया जा चुका है, यहाँ इसकी और अधिक स्पष्ट व्याख्या की जा रही है। भगवान् ने कहा कि ब्रह्मा को बताए गए श्रीमद्-भागवतम का संक्षिप्त रूप उनके व्यक्तित्व को स्पष्ट करने के लिए था। दूसरे कांड में दिए गए चार छंदों की निरपेक्ष व्याख्या इसके साथ ही निरस्त हो जाती है। इस संबंध में श्रीधर स्वामी यह भी स्पष्ट करते हैं कि भागवतम का वही संक्षिप्त रूप भगवान कृष्ण की लीलाओं से संबंधित था और इसका कभी भी निरपेक्ष अभिलाषा से कोई लेना-देना नहीं रहा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥