श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.33.34 
सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिश्चाप्सरोगणै: ।
स्तूयमान: समुद्रेण दत्तार्हणनिकेतन: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
जब वे उत्तर दिशा में जा रहे थे, तो चैराणों, गंधर्वों, मुनियों और अप्सराओं ने उनकी स्तुति की और हर तरह से उनका सम्मान किया। समुद्र ने उन्हें प्रेमपूर्वक अर्चना की और उनके रहने के लिए जगह दी।
 
As he was going northwards, the charans, gandharvas, sages and nymphs praised him and honoured him in every way. The ocean worshipped him and gave him a place to live.
तात्पर्य
यह समझा जाता है कि कपिल मुनि सबसे पहले हिमालय की ओर गए और गंगा नदी के मार्ग का पता लगाया, और वे फिर से समुद्र में गंगा के डेल्टा में आए जिसे अब बंगाल की खाड़ी के नाम से जाना जाता है। समुद्र ने उन्हें एक ऐसे स्थान पर निवास दिया जो अभी भी गंगा सागर के नाम से जाना जाता है, जहाँ गंगा नदी समुद्र से मिलती है। उस स्थान को गंगा सागर-तीर्थ कहा जाता है, और आज भी लोग दर्शन शास्त्र के सांख्य दर्शन के मूल लेखक कपिलदेव को सम्मान देने के लिए वहाँ इकट्ठा होते हैं। दुर्भाग्य से, इस सांख्य प्रणाली को एक धोखेबाज द्वारा गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है जिसका नाम भी कपिल है, लेकिन दर्शन की वह अन्य प्रणाली श्रीमद्-भागवतम में कपिल के सांख्य में वर्णित किसी भी चीज़ से मेल नहीं खाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)