श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.33.14 
अभीक्ष्णावगाहकपिशान्जटिलान्कुटिलालकान् ।
आत्मानं चोग्रतपसा बिभ्रती चीरिणं कृशम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
वह प्रतिदिन तीन बार स्नान करने लगी, जिससे उसके काले घुँघराले बाल धीरे-धीरे सफेद होते गए। तपस्या के कारण उसका शरीर कमज़ोर होता गया और वह पुराने वस्त्र पहनने लगी।
 
She started bathing three times a day and thus her curly black hair gradually turned grey. Due to penance her body gradually became lean and thin and she wore old clothes.
तात्पर्य
योगी, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्‍यासी रोज कम-से-कम तीन बार स्‍नान करने का विधान है - प्रातः काल, मध्‍याह्न और शाम को। यह नियम कुछ गृहस्‍थों, विशेषकर ब्राह्मणों द्वारा भी सख्‍ती से पालन किया जाता है, जो आध्‍यात्मिक चेतना में ऊंचे उठे होते हैं। देवहूति एक राजकुमारी थी और लगभग एक राजा की पत्‍नी भी। हालाँकि कर्दम मुनि राजा नहीं थे, लेकिन अपनी योगिक शक्ति से उन्होंने देवहूति को सुख-सुविधाओं और नौकर-चाकरों से युक्‍त एक साफ-सुथरे महल में ठहराया। लेकिन क्‍योंकि उन्‍होंने अपने पति की मौजूदगी में भी तपस्‍या ही सीखी थी, उनके लिए तपस्‍या करना कोई मुश्किल बात नहीं थी। इसके बावजूद, अपने पति और पुत्र के चले जाने के बाद उन्‍होंने अपने शरीर पर बहुत सख्‍त तपस्‍या की और वह पतली हो गईं। आध्‍यात्मिक रूप से आगे की जिंदगी के लिए बहुत मोटा होना ठीक नहीं। बल्कि, व्‍यक्ति को अपना वजन कम करना चाहिए क्‍योंकि वजन के कारण आध्‍यात्मिक समझ में प्रगति में बाधा उत्‍पन्‍न होती है। व्‍यक्ति को सावधानी रखनी चाहिए कि वह ज्‍यादा न खाए, ज्‍यादा न सोए और आरामदायक मुद्रा में न रहे। स्‍वेच्‍छा से थोड़ा तप और परेशानी उठाकर व्‍यक्ति को कम भोजन ग्रहण करना चाहिए और कम सोना चाहिए। किसी भी तरह का योग - चाहे भक्ति योग हो, ज्ञान योग हो या हठ योग हो - का अभ्‍यास करने की प्रक्रिया यही होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)