मुक्ति का अर्थ है स्वयं की स्थिति में स्थित होना। श्रीमद्भागवत में इसकी यही परिभाषा दी गई है: मुक्ति... स्वरूपेण व्यवस्थितिः। जीव की वास्तविक पहचान या स्वरूप का वर्णन भगवान चैतन्य ने किया है। जीवेर स्वरूप हाए-कृष्णेर नित्य-दास: अर्थात जीव की वास्तविक पहचान यह है कि वह परमेश्वर का शाश्वत सेवक है। यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह से भगवान की सेवा में तल्लीन है, तो उसे मुक्त समझा जाना चाहिए। किसी के भक्ति सेवा में कार्यकलाप से ही यह समझना चाहिए कि वह मुक्त है अथवा नहीं, न कि अन्य लक्षणों से।
