श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.32.9 
क्ष्माम्भोऽनलानिलवियन्मनइन्द्रियार्थ-
भूतादिभि: परिवृतं प्रतिसञ्जिहीर्षु: ।
अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा
कालं पराख्यमनुभूय पर: स्वयम्भू: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
त्रिगुणात्मक प्रकृति के दो परार्धों के निवास योग्य काल का अनुभव करने के बाद श्री ब्रह्मा इस ब्रह्मांड का, जो पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, अहंकार आदि आवरणों से ढका हुआ है, संहार कर भगवान के पास चले जाते हैं।
 
After experiencing the time of two parardhas (periods of time) in which the trigunaatmika nature resides, Sri Brahma destroys this universe which is covered by the coverings of earth, water, air, fire, sky, mind, ego etc. and goes to God.
तात्पर्य
इस श्लोक में अव्यक्तम् शब्द का बहुत महत्व है। भगवद् गीता में भी इसी अर्थ को संतान शब्द से अभिव्यक्त किया गया है। यह भौतिक जगत व्यक्त है अर्थात् परिवर्तनों के अधीन है और इसका अन्त भी हो जाता है। किन्तु इस भौतिक जगत की प्रलय के बाद आध्यात्मिक जगत अर्थात् सनातन धाम की अभिव्यक्ति शेष रहती है। वह आध्यात्मिक आकाश अव्यक्त कहलाता है जो बदलता नहीं है और वहीं परम व्यक्तित्व भगवान निवास करते हैं। जब ब्रह्माजी समय के तत्व के प्रभाव में इस भौतिक ब्रह्माण्ड पर शासन करने के पश्चात् इसका विलय करना चाहते हैं और भगवान के राज्य में प्रवेश करना चाहते हैं तब वे अपने साथ अन्य लोगों को भी भगवान के राज्य में ले जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)