श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.32.41 
श्रद्दधानाय भक्ताय विनीतायानसूयवे ।
भूतेषु कृतमैत्राय शुश्रूषाभिरताय च ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसे भक्तिपूर्ण श्रद्धालु को उपदेश दिया जाना चाहिए जो अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार रखता हो, ईर्ष्या की भावना से रहित हो, सभी प्रकार के जीवों के प्रति मैत्रीपूर्ण व्यवहार व दृष्टिकोण रखता हो और अपनी श्रद्धा और ईमानदारी के साथ सेवा करने को हमेशा उत्सुक रहता हो।
 
The sermon should be given to such a devout devotee who is respectful towards the Guru, does not hold any hatred, has friendly feelings towards all living beings and is eager to serve with devotion and sincerity.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)