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bhagavat 3.32.17: इस प्रकार के लोग, रजोगुण से प्रेरित होकर चिंताओं से ग्रसित रहते हैं और इंद्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण हमेशा इंद्रिय तृप्ति की इच्छा करते रहते हैं। वे पितरों की पूजा करते हैं और अपने परिवार, समाज या राष्ट्रीय जीवन की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए रात-दिन लगे रहते हैं।   |   bhagavat अध्याय 3.32: कर्म-बन्धन   ।   bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.32.17 
रजसा कुण्ठमनस: कामात्मानोऽजितेन्द्रिया: ।
पितृन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशया: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार के लोग, रजोगुण से प्रेरित होकर चिंताओं से ग्रसित रहते हैं और इंद्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण हमेशा इंद्रिय तृप्ति की इच्छा करते रहते हैं। वे पितरों की पूजा करते हैं और अपने परिवार, समाज या राष्ट्रीय जीवन की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए रात-दिन लगे रहते हैं।
 
Such people, driven by the mode of passion, are full of worries and, unable to control their senses, are always seeking sense gratification. They worship the ancestors and work day and night to improve the economic condition of their family, social or national life.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)