श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.31.9 
अकल्प: स्वाङ्गचेष्टायां शकुन्त इव पञ्जरे ।
तत्र लब्धस्मृतिर्दैवात्कर्म जन्मशतोद्भवम् ।
स्मरन्दीर्घमनुच्छ्‌वासं शर्म किं नाम विन्दते ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार बच्चा पिंजरे में बंद पक्षी की तरह बिना किसी गतिविधि के रहता है। यदि वह बच्चा भाग्यशाली है, तो उसे पिछले जन्मों के सारे कष्टों की याद आती है और वह अत्यधिक दुखी होता है। ऐसी स्थिति में मन की शांति तो असंभव है।
 
In this way the child remains motionless like a bird in a cage. At that time, if the child is fortunate, he remembers the sufferings of the past hundred births and sighs in sorrow. How is peace of mind possible in such a condition?
तात्पर्य
जन्म के बाद, बालक अपने पिछले जन्मों के कष्टों को भूल जाता है परन्तु जब हम वयस्क हो जाते हैं, हम कम-से-कम जन्म-मरण के समय को यथार्थ में झेली गई दुःखद यातनाओं को श्रीमद्भागवतम जैसे प्रामाणिक शास्त्रों को पढ़कर समझ ही सकते हैं। यदि हम शास्त्रों में विश्वास नहीं करते, तो यह एक अलग सवाल है परन्तु यदि ऐसे वर्णनों की प्रामाणिकता में हमारा विश्वास है तो हमें आने वाले जन्म में अपनी मुक्ति के लिए आवश्यक तैयारी करनी चाहिए। यह केवल इस मानव जन्म में ही संभव है। जो व्यक्ति मानव जीवन में दुख के इन संकेतों को ध्यान में नहीं रखता, निश्चित ही वह आत्महत्या कर रहा है। ऐसा कहा जाता है कि मानवीय जन्म का यह शरीर माया या भौतिक अस्तित्व की अज्ञानता को पार करने का एकमात्र साधन है। हमारे पास मानव शरीर के रूप में एक अत्यंत कुशल नाव है और एक बहुत ही कुशल कप्तान है, आध्यात्मिक गुरु। शास्त्रों के निर्देश अनुकूल हवाओं की तरह हैं। यदि हम इन सभी सुविधाओं के बावजूद भौतिक अस्तित्व की अज्ञानता के समुद्र को पार नहीं कर पाते हैं, तो निश्चित रूप से हम सभी जानबूझकर आत्महत्या कर रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)