श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.31.48 
सम्यग्दर्शनया बुद्ध्या योगवैराग्ययुक्तया ।
मायाविरचिते लोके चरेन्न्यस्य कलेवरम् ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
भौतिक पहचान के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण के साथ-साथ सही दृष्टिकोण और भक्तिभाव से युक्त होकर मनुष्य को तर्क के द्वारा अपने शरीर को इस मायावी संसार को समर्पित करना चाहिए। इस तरह वह इस भौतिक जगत से अपना लगाव दूर कर सकता है।
 
Equipped with correct viewpoint, strengthened with devotion and equated with a pessimistic attitude towards material identity, man should mortgage his body to this illusory world through logic. In this way he can free himself from this world.
तात्पर्य
कभी-कभी यह गलत समझा जाता है कि अगर किसी को भक्ति में लगे हुए व्यक्तियों से जुड़ना है, तो वह आर्थिक समस्या को हल करने में सक्षम नहीं होगा। इस तर्क का उत्तर देने के लिए, यहाँ इसका वर्णन किया गया है कि भगवत्प्रेमी व्यक्तियों से सीधे, भौतिक रूप से नहीं, बल्कि दर्शन और तर्क के माध्यम से जीवन की समस्याओं को समझकर जुड़ना है। यहाँ कहा गया है, सम्यग-दर्शनया बुद्धया: किसी को पूरी तरह से देखना है, और बुद्धि और योगिक अभ्यास से इस संसार का त्याग करना है। श्रीमद्-भागवतम के प्रथम खंड के दूसरे अध्याय में सुझाई गई प्रक्रिया द्वारा उस त्याग को प्राप्त किया जा सकता है।

भक्त की बुद्धि हमेशा भगवान के साथ जुड़ी रहती है। भौतिक अस्तित्व के प्रति उसका दृष्टिकोण वैराग्य का होता है, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि यह भौतिक दुनिया भ्रामक ऊर्जा की रचना है। स्वयं को परमात्मा का अभिन्न अंग मानकर, भक्त अपनी भक्ति सेवा का निर्वहन करता है और भौतिक क्रिया और प्रतिक्रिया से पूरी तरह से अलग रहता है। इस प्रकार अंत में वह अपने भौतिक शरीर या भौतिक ऊर्जा को त्याग देता है, और शुद्ध आत्मा के रूप में वह परमधाम में प्रवेश करता है।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत इकतीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)