भक्त की बुद्धि हमेशा भगवान के साथ जुड़ी रहती है। भौतिक अस्तित्व के प्रति उसका दृष्टिकोण वैराग्य का होता है, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि यह भौतिक दुनिया भ्रामक ऊर्जा की रचना है। स्वयं को परमात्मा का अभिन्न अंग मानकर, भक्त अपनी भक्ति सेवा का निर्वहन करता है और भौतिक क्रिया और प्रतिक्रिया से पूरी तरह से अलग रहता है। इस प्रकार अंत में वह अपने भौतिक शरीर या भौतिक ऊर्जा को त्याग देता है, और शुद्ध आत्मा के रूप में वह परमधाम में प्रवेश करता है।
