भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व भौतिक सृष्टि से परे है। शंकराचार्य जैसे अवैयक्तिकवादियों द्वारा भी यह स्वीकार किया जाता है कि नारायण इस भौतिक सृष्टि से परात्पर हैं। जैसे ही कोई वास्तव में भगवान की सेवा में विभिन्न रूपों में संलग्न होता है, या तो नारायण या राधा-कृष्ण या सीता-राम, उसे मुक्ति के मंच पर माना जाता है। भागवतम् इस बात की पुष्टि भी करता है कि मुक्ति का अर्थ है अपनी संवैधानिक स्थिति में स्थित होना। चूँकि एक जीवित इकाई सनातन रूप से सर्वोच्च भगवान का सेवक है, जब कोई गंभीरता से और ईमानदारी से भगवान की पारलौकिक प्रेममय सेवा में संलग्न होता है, तो वह मुक्ति की स्थिति में स्थित होता है। किसी को मुक्त व्यक्ति के साथ जुड़ने का प्रयास करना चाहिए, और फिर जीवन की समस्याओं, अर्थात् जन्म और मृत्यु को हल किया जा सकता है।
पूर्ण कृष्ण चेतना में भक्ति सेवा का निर्वहन करते समय, किसी को कंजूस नहीं होना चाहिए। उसे बेवजह यह नहीं दिखाना चाहिए कि उसने इस संसार को त्याग दिया है। वास्तव में, त्याग संभव नहीं है। यदि कोई अपनी महल जैसी इमारत को त्यागकर जंगल में चला जाता है, तो वास्तव में कोई त्याग नहीं होता है, क्योंकि महल जैसी इमारत भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की संपत्ति है और जंगल भी भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की संपत्ति है। यदि वह एक संपत्ति से दूसरी संपत्ति में चला जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह त्याग करता है; वह कभी भी महल या जंगल का स्वामी नहीं था। त्याग के लिए इस झूठी समझ को त्यागना आवश्यक है कि कोई प्रकृति के स्वामी हो सकता है। जब कोई इस झूठे रवैये को त्यागता है और इस फूली हुई स्थिति को त्यागता है कि वह भी भगवान है, तो यही वास्तविक त्याग है। अन्यथा त्याग का कोई अर्थ नहीं है। रूप गोस्वामी ने सलाह दी है कि यदि कोई ऐसी किसी चीज़ का त्याग करता है जिसका उपयोग भगवान की सेवा में किया जा सकता है और उस उद्देश्य के लिए उसका उपयोग नहीं करता है, तो उसे फलु-वैराग्य कहा जाता है, अपर्याप्त या झूठा त्याग। सब कुछ भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का है; इसलिए सब कुछ भगवान की सेवा में लगाया जा सकता है; किसी के भी कामुकता संतुष्टि के लिए कुछ भी इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यही वास्तविक त्याग है। न ही व्यक्ति को शरीर की आवश्यकताओं को अनावश्यक रूप से बढ़ाना चाहिए। हमें बहुत अधिक व्यक्तिगत प्रयास के बिना कृष्ण द्वारा दी गई और प्राप्त की गई किसी भी चीज़ से संतुष्ट रहना चाहिए। हमें अपना समय कृष्ण भावना में भक्ति सेवा का पालन करने में बिताना चाहिए। यही जीवन और मृत्यु की समस्या का समाधान है।
