श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  3.31.45-46 
द्रव्योपलब्धिस्थानस्य द्रव्येक्षायोग्यता यदा ।
तत्पञ्चत्वमहंमानादुत्पत्तिर्द्रव्यदर्शनम् ॥ ४५ ॥
यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा ।
तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वायोग्यतानयो: ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
जब आँखों की दृष्टि-तंत्रिका प्रभावित हो जाती है और रंग या रूप को देखने की क्षमता समाप्त हो जाती है, तब चक्षु-इन्द्रिय निष्क्रिय हो जाती है। जीव, जो आँखों और दृष्टि का द्रष्टा है, अपनी देखने की क्षमता खो देता है। उसी प्रकार, जब भौतिक शरीर, जहाँ वस्तुओं की अनुभूति होती है, अनुभव करने में असमर्थ हो जाता है, तो इसे मृत्यु कहा जाता है। जब मनुष्य शारीरिक शरीर को स्वयं मानने लगता है, तो इसे जन्म कहा जाता है।
 
When the eyes lose the power to perceive colour or form due to the optic nerve being affected, the sense of sight becomes almost dead. Then the being who sees the eye and sight loses his power to see. Similarly, when the physical body, which is the seat of perception of things, ceases to perceive, this inability is called death. When a man starts considering the body as his own self, it is called birth.
तात्पर्य
जब कोई कहता है, "मैं देखता हूँ," तो इसका अर्थ है कि वह अपनी आँखों से या अपने चश्मे से देखता है; वह दृष्टि के उपकरण से देखता है। यदि दृष्टि का उपकरण टूट जाता है या रोगग्रस्त हो जाता है या कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, तो वह भी, देखने वाले के रूप में, कार्य करना बंद कर देता है। इसी तरह, इस भौतिक शरीर में, वर्तमान क्षण में जीव आत्मा कार्य कर रहा है, और जब भौतिक शरीर, काम करने में अपनी अक्षमता के कारण, कार्य करना बंद कर देता है, तो वह भी अपनी प्रतिक्रियात्मक गतिविधियों को करना बंद कर देता है। जब किसी का कार्य का उपकरण टूट जाता है और कार्य नहीं कर सकता है, तो उसे मृत्यु कहा जाता है। पुनः, जब किसी को कार्य के लिए एक नया उपकरण मिलता है, तो उसे जन्म कहा जाता है। जन्म और मृत्यु की यह प्रक्रिया निरंतर शारीरिक परिवर्तन से हर पल चल रही है। अंतिम परिवर्तन को मृत्यु कहा जाता है, और नए शरीर को स्वीकार करना जन्म कहलाता है। यही जन्म और मृत्यु के प्रश्न का समाधान है। वास्तव में, जीवित संस्था का न जन्म होता है और न ही मृत्यु, बल्कि वह शाश्वत है। जैसा कि भगवद-गीता में पुष्टि की गई है, न हन्यते हन्यामाने शरीरे: जीवित संस्था कभी नहीं मरती, यहाँ तक कि इस भौतिक शरीर की मृत्यु या विनाश के बाद भी नहीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)