अपने विशेष प्रकार के शरीर के कारण भौतिक प्राणी अपने कर्मों के अनुरूप एक लोक से दूसरे लोक में भटकते रहता है। इस प्रकार से वह कर्मों में संलग्न होकर निरंतर उनके सुखों का भोग करता रहता है।
Due to having a special type of body, the materialistic soul wanders from one world to another according to his karma. In this way, he engages himself in fruitive activities and continuously enjoys the fruits.
तात्पर्य
जब जीवित सत्ता भौतिक देह से आवृत होती है, उसे जीव-भूत कहते हैं और जब वह भौतिक देह से मुक्त होती है उसे ब्रह्म-भूत कहते हैं। प्रत्येक जन्म में अपनी भौतिक देह बदलकर वह न केवल विभिन्न जीवन प्रजातियों में विचरण करती है, बल्कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर भी जाती है। भगवान चैतन्य कहते हैं कि जीव, गतिविधियों के फल से बंधे हुए, इस तरह पूरे ब्रह्माण्ड में भटकते हैं और अगर कुछ अवसर से या धर्मपूर्ण गतिविधियों से वे एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु के संपर्क में आते हैं, तो कृष्ण की कृपा से, उन्हें भक्ति भाव की बुआई का बीज प्राप्त होता है। इस बीज को प्राप्त करने के बाद, अगर कोई अपने हृदय में बोता है और सुनने और जप करने से उस पर पानी डालता है, तो वह बीज एक बड़े पौधे में विकसित हो जाता है, और इसमें फल और फूल लगते हैं जिसका जीवित सत्ता इस भौतिक दुनिया में भी आनंद उठा सकती है। इसे ब्रह्म-भूत स्तर कहते हैं। अपनी नियत स्थिति में, जीव को भौतिकवादी कहा जाता है और जब सभी नियतियों से मुक्त होने पर, वह पूर्ण रूप से कृष्ण-चेतन, भक्ति सेवा से जुड़ी होती है, इसे मुक्ति कहा जाता है। जब तक किसी को प्रभु की कृपा से एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु से जुड़ने का अवसर नहीं मिलता, उसके भिन्न-भिन्न जीवन प्रजातियों और विभिन्न श्रेणी के ग्रहों में जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होने की कोई संभावना नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥