श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.31.42 
तामात्मनो विजानीयात्पत्यपत्यगृहात्मकम् ।
दैवोपसादितं मृत्युं मृगयोर्गायनं यथा ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए महिला को अपने पति, घर और अपने बच्चों को भगवान की बाहरी शक्ति की व्यवस्था समझकर अपनी मृत्यु से जोड़ना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे शिकारी का मीठा स्वर हरिण के लिए मृत्यु होता है।
 
Therefore a woman should consider her husband, home and children as arrangements of God's external power for her death. Just like the sweet tune of a hunter is death for a deer.
तात्पर्य
भगवान कपिलदेव के इन निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि न केवल स्त्री पुरुष के लिए नरक का द्वार है, बल्कि पुरुष भी स्त्री के लिए नरक का द्वार है। यह आसक्ति का प्रश्न है। एक पुरुष उसकी सेवा, उसकी सुंदरता और कई अन्य संपत्तियों के कारण स्त्री से जुड़ जाता है, और इसी तरह एक स्त्री भी पुरुष से उसके द्वारा रहने के लिए एक अच्छी जगह, गहने, कपड़े और बच्चे देने के लिए जुड़ जाती है। यह एक-दूसरे के लिए आसक्ति का प्रश्न है। जब तक या तो ऐसे भौतिक सुख के लिए दूसरे से जुड़ा रहता है, तब तक स्त्री पुरुष के लिए खतरनाक है, और पुरुष भी स्त्री के लिए खतरनाक है। लेकिन अगर आसक्ति को कृष्ण में स्थानांतरित कर दिया जाए, तो दोनों कृष्ण भावना से परिपूर्ण हो जाते हैं, और तब विवाह बहुत अच्छा होता है। श्रील रूप गोस्वामी इसलिए सलाह देते हैं:

अनासक्तस्य विषयान्

यथार्हम् उपयुंजत:

निर्बन्ध: कृष्ण-सम्बन्धे

युक्तं वैराग्यं उच्यते

(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.2.255)

पुरुष और स्त्री को कृष्ण की सेवा में कर्तव्यों का निर्वहन करने के उद्देश्य से ही कृष्ण के साथ संबंध में गृहस्थ के रूप में एक साथ रहना चाहिए। बच्चों, पत्नी और पति सभी को कृष्णभावनापूर्ण कर्तव्यों में लगाओ, और तब ये सभी शारीरिक या भौतिक आसक्तियाँ गायब हो जाएँगी। चूँकि माध्यम कृष्ण हैं, इसलिए चेतना शुद्ध है और किसी भी समय पतन की कोई संभावना नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)