अनासक्तस्य विषयान्
यथार्हम् उपयुंजत:
निर्बन्ध: कृष्ण-सम्बन्धे
युक्तं वैराग्यं उच्यते
(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.2.255)
पुरुष और स्त्री को कृष्ण की सेवा में कर्तव्यों का निर्वहन करने के उद्देश्य से ही कृष्ण के साथ संबंध में गृहस्थ के रूप में एक साथ रहना चाहिए। बच्चों, पत्नी और पति सभी को कृष्णभावनापूर्ण कर्तव्यों में लगाओ, और तब ये सभी शारीरिक या भौतिक आसक्तियाँ गायब हो जाएँगी। चूँकि माध्यम कृष्ण हैं, इसलिए चेतना शुद्ध है और किसी भी समय पतन की कोई संभावना नहीं है।
