पूर्व जन्म में स्त्री-आसक्ति के कारण जीव स्त्री का रूप लेता है। अज्ञानतावश माया को अपना पति मानकर सम्पत्ति, सन्तान, घर और अन्य भौतिक साजोसामान देने वाला समझता है।
Due to attachment to a woman in the previous life, the soul takes the form of a woman and foolishly considers Maya to be his husband and believes that she is the one who gives him wealth, children, home and other material things.
तात्पर्य
इस श्लोक से ऐसा प्रतीत होता है कि एक महिला को भी अपने पिछले जीवन में एक पुरुष माना गया है, और अपनी पत्नी से आसक्ति के कारण, अब उसके पास एक महिला का शरीर है। भगवद-गीता इसकी पुष्टि करती है: एक व्यक्ति को मृत्यु के समय जो कुछ भी सोच रहा होता है, उसके अनुसार उसका अगले जन्म में जन्म होता है। यदि कोई अपनी पत्नी से बहुत अधिक जुड़ा हुआ है, तो स्वाभाविक रूप से वह मृत्यु के समय अपनी पत्नी के बारे में सोचता है, और अपने अगले जीवन में वह एक महिला का शरीर धारण करता है। इसी तरह, यदि कोई महिला मृत्यु के समय अपने पति के बारे में सोचती है, तो स्वाभाविक रूप से उसे अगले जन्म में एक पुरुष का शरीर मिलता है। हिंदू धर्मग्रंथों में, इसलिए, महिला की पवित्रता और मनुष्य के प्रति समर्पण पर बहुत जोर दिया गया है। एक महिला की अपने पति से आसक्ति उसे उसके अगले जीवन में एक पुरुष के शरीर में ऊपर उठा सकती है, लेकिन एक पुरुष की एक महिला के प्रति आसक्ति उसे नीचा दिखाएगी, और उसके अगले जीवन में उसे एक महिला का शरीर मिलेगा। हमें हमेशा याद रखना चाहिए, जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, कि स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार के भौतिक शरीर कपड़े हैं; वे जीवित इकाई की कमीज और कोट हैं। एक महिला या पुरुष होना केवल किसी के शारीरिक कपड़े से जुड़ा होता है। प्रकृति में आत्मा वास्तव में परम भगवान की सीमांत ऊर्जा है। प्रत्येक जीवित इकाई, जिसे ऊर्जा के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, माना जाता है कि वह मूल रूप से एक महिला है, या जिसे भोगा जाता है। एक पुरुष के शरीर में भौतिक चंगुल से बाहर निकलने का अधिक अवसर होता है; एक महिला के शरीर में कम अवसर होता है। इस श्लोक में यह संकेत दिया गया है कि एक पुरुष के शरीर का दुरुपयोग महिलाओं से लगाव बनाने और इस प्रकार भौतिक सुख में बहुत अधिक उलझने के कारण नहीं किया जाना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप अगले जीवन में एक महिला का शरीर प्राप्त होगा। एक महिला आमतौर पर घरेलू समृद्धि, आभूषण, फर्नीचर और कपड़े पसंद करती है। जब पति ये सब चीजें पर्याप्त मात्रा में देता है तो वह संतुष्ट हो जाती है। पुरुष और महिला के बीच का संबंध बहुत जटिल है, लेकिन सार यह है कि जो आध्यात्मिक बोध की पारलौकिक अवस्था पर चढ़ने की इच्छा रखता है, उसे एक महिला के संघ को स्वीकार करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। कृष्ण चेतना के स्तर पर, हालांकि, संघ के ऐसे प्रतिबंध को शिथिल किया जा सकता है क्योंकि यदि किसी पुरुष और महिला का लगाव एक-दूसरे से नहीं बल्कि कृष्ण से है, तो फिर वे दोनों समान रूप से भौतिक उलझाव से बाहर निकलने और कृष्ण के निवास तक पहुँचने के पात्र हैं। जैसा कि भगवद-गीता में पुष्टि की गई है, कोई भी जो गंभीरता से कृष्ण चेतना को अपनाता है - चाहे जीवन की सबसे निचली प्रजाति में या एक महिला या निम्न बुद्धिमान वर्गों में, जैसे कि व्यापारी या मजदूर वर्ग - वह वापस घर, भगवान के पास जाएगा, और कृष्ण के निवास तक पहुंचेगा। एक पुरुष को किसी स्त्री से आसक्त नहीं होना चाहिए और न ही किसी स्त्री को किसी पुरुष से आसक्त होना चाहिए। पुरुष और महिला दोनों को भगवान की सेवा से जुड़ना चाहिए। तब उन दोनों के लिए भौतिक उलझाव से मुक्ति की संभावना है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥