यहाँ प्रतलब्धात्म-लाभ शब्द प्रयुक्त हुआ है। आत्मा का अर्थ है "स्व" और लाभ का अर्थ है "प्राप्ति।" आम तौर पर, बंधी हुई आत्माएँ अपनी आत्मा, या स्वयं को खो चुकी होती हैं, लेकिन जो लोग अनुत्तरित होते हैं उन्होंने स्वयं को महसूस किया है। यह निर्देश दिया गया है कि ऐसे आत्म-साक्षात्कार वाली आत्मा जो योग्य पूर्णता के सर्वोच्च मंच की आकांक्षा रखती है, उसे युवतियों के साथ संगति नहीं करनी चाहिए। हालाँकि, आधुनिक युग में, बहुत सारे बदमाश हैं जो यह सलाह देते हैं कि जब किसी के पास जननांग होते हैं तो उसे महिलाओं का जितना चाहे उतना आनंद लेना चाहिए, और साथ ही वह योगी बन सकता है। किसी भी मानक योग प्रणाली में महिलाओं का संगति स्वीकार नहीं किया जाता है। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महिलाओं का संगति नारकीय जीवन का प्रवेश द्वार है। वैदिक सभ्यता में महिलाओं का संगति बहुत ज़्यादा प्रतिबंधित है। चार सामाजिक विभाजनों में से, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और सन्यासी - तीन आदेश महिलाओं के संगति करने से सख्ती से निषिद्ध हैं; केवल गृहस्थों, या गृहस्थों, को एक महिला के साथ घनिष्ठ संबंध रखने का लाइसेंस दिया जाता है, और वह संबंध भी अच्छे बच्चों को जन्म देने के लिए प्रतिबंधित है। हालाँकि, यदि कोई भौतिक दुनिया में निरंतर अस्तित्व को बनाए रखना चाहता है, तो वह बिना किसी रोक-टोक के महिला संगति में लिप्त हो सकता है।
