श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.31.31 
तदर्थं कुरुते कर्म यद्बद्धो याति संसृतिम् ।
योऽनुयाति ददत्‍क्‍लेशमविद्याकर्मबन्धन: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
अज्ञान एवं कर्मों की ग्रंथियों से बँधा जीव निरंतर कष्ट देने वाले इस शरीर के लिए कई कार्य करता है जिससे वह जन्म-मृत्यु के बंधन में पड़ जाता है।
 
The body which is a source of constant suffering for the living being and which follows the living being bound by ignorance and karma, the living being has to perform many types of activities for that body due to which it becomes subject to the cycle of birth and death.
तात्पर्य
भगवद्-गीता में कहा गया है कि किसी को यज्ञ या विष्णु को संतुष्ट करने के लिए ही कार्य करना चाहिए, क्योंकि भगवान की संतुष्टि के उद्देश्य के बिना किए गए किसी भी कार्य में बंधन का कारण होता है। संचालित अवस्था में एक जीव, अपने शरीर को स्वयं के रूप में स्वीकार कर, भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल जाता है और अपने शरीर के हित में कार्य करता है। वह शरीर को स्वयं, अपने शारीरिक विस्तार को अपने संबंधियों और जिस भूमि से उसका शरीर पैदा हुआ है, उसे पूजा के योग्य मानता है। इस प्रकार वह सभी प्रकार की गलत गतिविधियाँ करता है, जो उसे जन्म और मृत्यु के दोहराव में विभिन्न प्रजातियों में बंधन की ओर ले जाती हैं।

आधुनिक सभ्यता में, तथाकथित सामाजिक, राष्ट्रीय और सरकारी नेता जीवन की शारीरिक अवधारणा के तहत लोगों को गुमराह करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सभी नेता अपने अनुयायियों के साथ जन्म के बाद नरक जैसी परिस्थितियों में पहुँच जाते हैं। श्रीमद्-भागवत में एक दृष्टांत दिया गया है। अंधा यथांधैर उपनीयमानाः: जब एक नेत्रहीन कई अन्य नेत्रहीनों का नेतृत्व करता है, तो परिणामस्वरूप वे सभी एक खाई में गिर जाते हैं। वास्तव में ऐसा हो रहा है। अज्ञानी जनता का नेतृत्व करने के लिए कई नेता हैं, लेकिन चूंकि उनमें से प्रत्येक जीवन की शारीरिक अवधारणा से चकित है, इसलिए मानव समाज में कोई शांति और समृद्धि नहीं है। तथाकथित योगी भी, जो विभिन्न शारीरिक कार्य करते हैं, ऐसे ही अज्ञानी लोगों की श्रेणी में आते हैं क्योंकि हठ-योग प्रणाली उन लोगों के लिए विशेष रूप से अनुशंसित है जो शारीरिक अवधारणा में बहुत अधिक उलझे हुए हैं। निष्कर्ष यह है कि जब तक कोई शारीरिक अवधारणा में स्थिर रहता है, उसे जन्म और मृत्यु का सामना करना पड़ता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)