आधुनिक सभ्यता में, तथाकथित सामाजिक, राष्ट्रीय और सरकारी नेता जीवन की शारीरिक अवधारणा के तहत लोगों को गुमराह करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सभी नेता अपने अनुयायियों के साथ जन्म के बाद नरक जैसी परिस्थितियों में पहुँच जाते हैं। श्रीमद्-भागवत में एक दृष्टांत दिया गया है। अंधा यथांधैर उपनीयमानाः: जब एक नेत्रहीन कई अन्य नेत्रहीनों का नेतृत्व करता है, तो परिणामस्वरूप वे सभी एक खाई में गिर जाते हैं। वास्तव में ऐसा हो रहा है। अज्ञानी जनता का नेतृत्व करने के लिए कई नेता हैं, लेकिन चूंकि उनमें से प्रत्येक जीवन की शारीरिक अवधारणा से चकित है, इसलिए मानव समाज में कोई शांति और समृद्धि नहीं है। तथाकथित योगी भी, जो विभिन्न शारीरिक कार्य करते हैं, ऐसे ही अज्ञानी लोगों की श्रेणी में आते हैं क्योंकि हठ-योग प्रणाली उन लोगों के लिए विशेष रूप से अनुशंसित है जो शारीरिक अवधारणा में बहुत अधिक उलझे हुए हैं। निष्कर्ष यह है कि जब तक कोई शारीरिक अवधारणा में स्थिर रहता है, उसे जन्म और मृत्यु का सामना करना पड़ता है।
