श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.31.29 
सह देहेन मानेन वर्धमानेन मन्युना ।
करोति विग्रहं कामी कामिष्वन्ताय चात्मन: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
शरीर के बढ़ने के साथ जीव अपनी आत्मा पर विजय पाने के लिए अपने झूठे मान सम्मान और क्रोध को बढ़ाता है और इस प्रकार अपने ही समान वासनावश पुरुषों से शत्रुता उत्पन्न करता है।
 
As the body grows, the living being increases his false prestige and anger in order to defeat his soul and thus creates enmity with other lustful men like himself.
तात्पर्य
भगवद् गीता के तीसरे अध्याय में अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं कि प्राणियों में काम की उत्पत्ति कहाँ से होती है। कहा गया है कि एक जीव शाश्वत है और इस प्रकार गुणात्म रूप से परमेश्वर के समान है। तो किस कारण वह भौतिक जगत के चंगुल में फँस जाता है और भौतिक ऊर्जा के प्रभाव में बहुत से पापी कृत्य कैसे कर लेता है? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान कृष्ण कहते हैं कि काम ही वह चीज है जो जीव को उसकी उच्च स्थिति से भौतिक अस्तित्व की घृणित दशा में गिरा देता है। यह काम स्थिति के अनुसार क्रोध में बदल जाता है। काम और क्रोध दोनों ही रजोगुण पर आधारित हैं। वस्तुतः काम रजोगुण का ही उत्पाद है और काम की संतुष्टि के अभाव में, वही इच्छा अज्ञान के स्तर पर क्रोध में बदल जाती है। जब अज्ञान आत्मा को ढक देता है, तो यह नारकीय जीवन की सबसे घृणित दशा में उसके पतन का स्रोत बन जाता है। नारकीय जीवन से आध्यात्मिक समझ की सर्वोच्च स्थिति तक ऊपर उठना, इस काम को कृष्ण के प्रेम में बदलना है। वैष्णव सम्प्रदाय के एक महान आचार्य श्री नरोत्तम दास ठाकुर ने कहा, काम कृष्ण-कर्मार्पणे: अपने काम के कारण हम अपनी इन्द्रिय संतुष्टि के लिए बहुत सी चीजें चाहते हैं लेकिन उसी काम को शुद्ध तरीके से बदला जा सकता है ताकि हम सब कुछ भगवान के संतुष्टि के लिए चाहें। क्रोध का भी उपयोग उस व्यक्ति के प्रति किया जा सकता है जो नास्तिक है या जो भगवान से ईर्ष्यालु है। जैसे हम काम और क्रोध के कारण भौतिक अस्तित्व में प्रवेश कर गए हैं, वैसे ही इन दो गुणों को कृष्ण चेतना में आगे बढ़ने के उद्देश्य से उपयोग किया जा सकता है और व्यक्ति फिर से अपनी पिछली शुद्ध, आध्यात्मिक स्थिति में ऊपर उठ सकता है। श्रील रूप गोस्वामी ने अनुशंसा की है कि क्योंकि भौतिक अस्तित्व में हमारे पास इंद्रिय सुख के बहुत सारे साधन हैं, जिनकी हमें शरीर के रखरखाव के लिए आवश्यकता होती है, हमें उन सभी का उपयोग बिना किसी लगाव के, कृष्ण की इंद्रियों को संतुष्ट करने के उद्देश्य से करना चाहिए; यही वास्तविक त्याग है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)