इत्येवं शैशवं भुक्त्वा दु:खं पौगण्डमेव च ।
अलब्धाभीप्सितोऽज्ञानादिद्धमन्यु: शुचार्पित: ॥ २८ ॥
अनुवाद
इस प्रकार, बच्चा अपने बचपन से गुजरता है, विभिन्न प्रकार के कष्ट सहता है और किशोरावस्था प्राप्त करता है। किशोरावस्था में भी वह उन चीजों को पाने की इच्छा करता है जो उसके लिए अप्राप्य होती हैं, लेकिन जब वह उन्हें प्राप्त नहीं कर पाता है तो उसे पीड़ा होती है। इस प्रकार, अज्ञानता के कारण वह क्रोधित और दुखी हो जाता है।
In this way, the child spends his childhood suffering various kinds of troubles and reaches adolescence. Even in adolescence, he desires unobtainable things, but he feels pain when he does not get them. Thus, due to ignorance, he becomes angry and sad.
तात्पर्य
जन्म से लेकर पांच वर्ष की आयु तक का समय बाल्यावस्था कहलाता है| इसके बाद पांच वर्ष से लेकर पंद्रह वर्ष के अंत तक का समय पौगंड काल कहलाता है| सोलह वर्ष की आयु से यौवनारंभ होता है| बाल्यावस्था के कष्टों का वर्णन पहले ही किया जा चुका है किंतु यौवन में प्रवेश करने पर साथ ही साथ अब बालक स्कूल में प्रविष्ट कराया जाता है, जो बालक को रूचिकर नहीं होता| बालक की रुचि खेलने-कूदने में होती है किंतु उसे विवश होकर स्कूल जाना पड़ता है, पढ़ना पड़ता है और परीक्षा पास करने की चिन्ता करनी पड़ती है| कष्ट का एक और कारण यह भी है कि बालक खेलने-कूदने के लिए अनेक प्रकार की सामग्री चाहता है किंतु परिस्थिति ऐसी हो सकती है कि उसे सामग्री प्राप्त न हो पाए और इस प्रकार से वह व्यथित होकर दुःखी हो जाता है| संक्षेप में बालक बाल्यावस्था की तरह ही यौवन में भी सुखी नहीं रहता यौवन का तो कहना ही क्या| बालक खेलने-कूदने के लिए स्वयं ही अनेक प्रकार की अनिवार्य जरूरतें उत्पन्न कर लेते हैं और जब वे पूरी नहीं होती तब वे अत्यधिक क्रोधित हो जाते हैं और परिणामतः वे दुःखी होते हैं|
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥