बच्चा प्रार्थना करता है कि अंधकार के गर्भ के भीतर रहना बेहतर है और कृष्ण चेतना में लगातार तल्लीन रहना बेहतर है बजाय इसके कि बाहर निकल कर फिर से भ्रामक ऊर्जा का शिकार बनें। भ्रामक ऊर्जा पेट के अंदर और पेट के बाहर दोनों जगह काम करती है, लेकिन चाल यह है कि व्यक्ति को कृष्ण चेतन अवस्था में रहना चाहिए, और फिर ऐसी भयानक स्थिति का प्रभाव उस पर प्रतिकूल रूप से कार्य नहीं कर सकता। भगवद-गीता में कहा गया है कि किसी की बुद्धि उसकी मित्र है, और वही बुद्धि उसकी शत्रु भी हो सकती है। यहाँ भी यही विचार दोहराया गया है: सुहृदात्मनैव, मैत्रीपूर्ण बुद्धि। कृष्ण की व्यक्तिगत सेवा में बुद्धि को अवशोषित करना और कृष्ण की पूर्ण चेतना हमेशा आत्म-साक्षात्कार और मुक्ति का मार्ग है। अनावश्यक रूप से उत्तेजित हुए बिना, यदि हम हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का लगातार जप करके कृष्ण चेतना की प्रक्रिया को अपनाते हैं, तो जन्म और मृत्यु का चक्र हमेशा के लिए बंद हो सकता है।
यह यहाँ पूछा जा सकता है कि कैसे बच्चा कृष्ण चेतना को निष्पादित करने के लिए किसी भी साज-सज्जा के बिना माँ के गर्भ के भीतर पूरी तरह से कृष्ण चेतन हो सकता है। भगवान विष्णु, सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा के लिए साज-सज्जा की व्यवस्था करना आवश्यक नहीं है। बच्चा अपनी माँ के पेट के भीतर रहना चाहता है और साथ ही माया के चंगुल से मुक्त होना चाहता है। कृष्ण चेतना को विकसित करने के लिए किसी भौतिक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती है। व्यक्ति हर जगह और हर जगह कृष्ण चेतना की खेती कर सकता है, बशर्ते वह हमेशा कृष्ण के बारे में सोच सके। महामंत्र, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप माँ के पेट के भीतर भी किया जा सकता है। कोई सोते समय, काम करते समय, गर्भ में कैद रहते हुए या बाहर रहते हुए जप कर सकता है। यह कृष्ण चेतना किसी भी परिस्थिति में नहीं रोकी जा सकती। बच्चे की प्रार्थना का निष्कर्ष है: "मुझे इस स्थिति में रहने दो; हालाँकि यह बहुत दयनीय है, फिर से बाहर जाकर माया का शिकार न बनना बेहतर है।"
