श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.31.20 
सोऽहं वसन्नपि विभो बहुदु:खवासं
गर्भान्न निर्जिगमिषे बहिरन्धकूपे ।
यत्रोपयातमुपसर्पति देवमाया
मिथ्या मतिर्यदनु संसृतिचक्रमेतत् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए, हे प्रभु, यद्यपि मैं एक भयानक स्थिति में रह रहा हूँ, मैं अपनी माँ के गर्भ से बाहर आकर भौतिक जीवन के अन्धे कुएँ में गिरना नहीं चाहता। आपकी बाहरी ऊर्जा, जिसे देव-माया कहा जाता है, तुरंत नवजात शिशु को पकड़ लेती है और तुरंत ही झूठी पहचान, जो जन्म और मृत्यु के निरंतर चक्र की शुरुआत है, शुरू हो जाती है।
 
Therefore, O Lord, although I am living in a very dreadful condition, I do not want to come out of my mother's womb and fall into the dark pit of material life. Your external energy, called devamaya, immediately seizes the new-born child and immediately false self-knowledge begins, which is the beginning of the continuous cycle of birth and death.
तात्पर्य
जब तक बच्चा माता के गर्भ में होता है वह अत्यंत असुरक्षित व भयावह जीवन-स्थिति में होता है, किंतु लाभ है कि उसका सर्वोच्च स्वामी के साथ सम्बंध की शुद्ध चेतना पुनर्जीवित होती है तथा निस्तारण हेतु प्रार्थना होती है। किंतु जैसे ही वह उदर से बाहर आता है, माया अर्थात् मायावी ऊर्जा इतनी प्रबल होती है कि तत्काल ही उस पर छा जाती है और वह स्वयं को शरीर समझने लगता है। माया अर्थात् वि भ्रम या जो वास्तव में नहीं है। भौतिक जगत में प्रत्येक व्यक्ति स्वयं की पहचान अपने शरीर से करता है। 'मैं यह शरीर हूँ'-यह मिथ्या अहंकारी चेतना बच्चे के गर्भ से निकल आने से साथ ही विकसित हो जाती है। माता और और अन्य संबंधी बच्चे का इंतजार करते रहते हैं और जैसे ही बच्चा जन्म लेता है, माता उसे दूध पिलाती है और सभी उसकी देख-रेख करते हैं। जीव शीघ्र ही अपनी स्थिति को भूल जाता है और शारीरिक सम्बन्धों में उलझ जाता है। सम्पूर्ण भौतिक अस्तित्व जीवन की इस शारीरिक धारणा में उलझा रहता है। वास्तविक ज्ञान अर्थात् इस चेतना को विकसित करना कि 'मैं यह शरीर नहीं हूँ। मैं एक आत्मा हूँ, मैं सर्वोच्च स्वामी का अणु-भाग हूँ।' वास्तविक ज्ञान में त्याग आता है, या इस शरीर को आत्मा के रूप में न स्वीकार करना। माया के प्रभाव से, बाहरी ऊर्जा के कारण, उसकी जन्म के तुरंत बाद ही सब कुछ भूल जाता है। इसलिए बच्चा प्रार्थना करता है कि वह बाहर आने से अच्छा है कि गर्भ में ही बना रहे। ऐसा कहा जाता है कि शुकदेव गोस्वामी, इस विचार के कारण, 16 वर्ष तक माता के गर्भ में रहे, वह नहीं चाहते थे कि मिथ्या शारीरिक पहचान से घिर जाएँ। गर्भ में इस प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करने के बाद, 16 वर्ष पूरे होने पर, वह वहाँ से निकले और तुरंत घर छोड़ दिया ताकि माया के प्रभाव द्वारा ग्रहण न किया जा सकें। माया के प्रभाव को भगवद्गीता में भी अभेद्य बताया गया है। किंतु अभेद्य माया को केवल कृष्ण चेतना से ही जीता जा सकता है। भगवद्गीता में भी इस बात की पुष्टि की गई है (7.14): मां एव ये प्रपद्यन्ते मायां एतां तरन्ति ते। जो भी कृष्ण के चरण-कमलों में शरण लेता है, वह जीवन की इस मिथ्या धारणा से निकल सकता है। माया के प्रभाव के कारण ही, कृष्ण के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध को भूल जाता है और अपनी पहचान अपने शरीर और शरीर के उपोत्पादों से करता है- जैसे पत्नी, बच्चे, समाज, दोस्ती और प्रेम। इस प्रकार वह माया के प्रभाव का शिकार हो जाता है और उसका निरंतर जन्म-मरण का भौतिकवादी जीवन और अधिक कठोर होता जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)