श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.31.19 
पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रि:
शारीरके दमशरीर्यपर: स्वदेहे ।
यत्सृष्टयासं तमहं पुरुषं पुराणं
पश्ये बहिर्हृदि च चैत्यमिव प्रतीतम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
अन्य प्रकार के शरीर में निवास करने वाला जीव केवल प्रवृत्ति के अनुसार ही देखता है, वह अपने उस शरीर के अनुकूल और प्रतिकूल ज्ञानेन्द्रियों के संवेदनों को ही जानता है, परंतु मुझे ऐसा शरीर मिला हुआ है, जिसमें मैं अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखता हूँ और अपने जीवन के चरम लक्ष्य को समझता हूँ, अतः मैं उन सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान को प्रणाम करता हूँ, जिनके आशीर्वाद से मुझे यह शरीर मिला हुआ है और जिनकी कृपा से मैं उन्हें भीतर और बाहर देख सकता हूँ।
 
A living entity having another type of body sees only by intuition, and he knows only the perceptible and imperceptible experiences of that body, but I have such a body in which I control my senses and understand my destination, so I offer my respectful obeisances unto the Supreme Personality of Godhead by whose blessing I have received this body and by whose grace I can see Him inside and outside.
तात्पर्य
विभिन्न प्रकार के शरीरों की विकासवादी प्रक्रिया एक फलदार फूल की तरह है। जिस प्रकार एक फूल की वृद्धि में अलग-अलग चरण होते हैं जैसे कली अवस्था, खिलने की अवस्था और सुगंध और सुंदरता की परिपूर्ण, विकसित अवस्था, उसी प्रकार, 8,400,000 जातियाँ हैं जो धीरे-धीरे विकसित हो रहे शरीरों की हैं, और निम्न प्रजातियों से उच्च प्रजातियों की ओर एक व्यवस्थित प्रगति होती है। जीवन का मानवीय रूप सर्वोच्च माना जाता है, क्योंकि यह जन्म और मृत्यु के चंगुल से निकलने के लिए चेतना प्रदान करता है। माँ के गर्भ में भाग्यशाली बच्चा अपनी श्रेष्ठ स्थिति को समझता है और इस तरह अन्य शरीरों से अलग होता है। मनुष्य से निम्न स्तर के शरीर वाले जानवर केवल अपने शारीरिक कष्ट और सुख की परवाह करते हैं; वे जीवन की अपनी शारीरिक आवश्यकताओं से अधिक कुछ नहीं सोच सकते–खाना, सोना, संभोग करना और बचाव करना। लेकिन जीवन के मानवीय रूप में, भगवान की कृपा से, चेतना इतनी विकसित होती है कि एक व्यक्ति अपनी असाधारण स्थिति का मूल्यांकन कर सकता है और इस प्रकार आत्मा और परम प्रभु को महसूस कर सकता है।

दम-शरीरी शब्द का अर्थ है कि हमारे पास एक शरीर है जिससे हम इंद्रियों और मन को नियंत्रित कर सकते हैं। भौतिकवादी जीवन की जटिलता एक अनियंत्रित मन और अनियंत्रित इंद्रियों के कारण है। किसी को भी इस तरह के एक अच्छे मानवीय शरीर को प्राप्त करने के लिए भगवान के प्रति आभारी होना चाहिए और इसका उचित उपयोग करना चाहिए। एक पशु और एक मनुष्य के बीच का अंतर यह है कि पशु स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सकता है और उसमें शालीनता की समझ नहीं होती है, जबकि मनुष्य में शालीनता की समझ होती है और वह स्वयं को नियंत्रित कर सकता है। यदि यह नियंत्रण शक्ति मनुष्य द्वारा प्रदर्शित नहीं की जाती है, तो वह एक पशु से बेहतर नहीं है। इंद्रियों को नियंत्रित करके, या योग नियमन की प्रक्रिया द्वारा, कोई व्यक्ति अपने आत्मा, परमात्मा, दुनिया और उनके पारस्परिक संबंधों की स्थिति को समझ सकता है; इंद्रियों को नियंत्रित करके सब कुछ संभव है। अन्यथा, हम जानवरों से बेहतर नहीं हैं।

इंद्रियों को नियंत्रित करने के माध्यम से वास्तविक आत्म-साक्षात्कार यहाँ समझाया गया है। व्यक्ति को भगवान और साथ ही स्वयं को देखने की कोशिश करनी चाहिए। खुद को सर्वोच्च के समान समझना आत्म-साक्षात्कार नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि परम प्रभु अनादि या पुराण हैं, और उनका कोई अन्य कारण नहीं है। जीवित इकाई सर्वोच्च भगवान से भाग और पार्सल के रूप में जन्म लेती है। ब्रह्म-संहिता में पुष्टि की गई है, अनादिर् आदिर् गोविंदः: गोविंद, सर्वोच्च व्यक्ति, का कोई कारण नहीं है। वह अजन्मे हैं। लेकिन जीवित इकाई उनके द्वारा जन्म लेती है। जैसा कि भगवद्-गीता में पुष्टि की गई है, ममैवांशः: जीवित इकाई और सर्वोच्च प्रभु दोनों अजन्मे हैं, लेकिन यह समझना होगा कि भाग और पार्सल का सर्वोच्च कारण सर्वोच्च भगवान ही हैं। इसलिए ब्रह्म-संहिता कहती है कि सब कुछ सर्वोच्च भगवान (सर्व-कारण-कारणम) से आया है। वेदांत-सूत्र भी इस बात की पुष्टि करता है। जन्माद्यस्य यतः: परम सत्य सभी के जन्म का मूल स्रोत है। कृष्ण भी भगवद्-गीता में कहते हैं, अहं सर्वस्य प्रभवः: "मैं ब्रह्मा और भगवान शिव और जीवित प्राणियों सहित हर चीज के जन्म का स्रोत हूं।" यह आत्म-साक्षात्कार है। व्यक्ति को पता होना चाहिए कि वह परम प्रभु के नियंत्रण में है न कि यह सोचे कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र है। अन्यथा, उसे सशर्त जीवन में क्यों डाला जाना चाहिए?

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)