दम-शरीरी शब्द का अर्थ है कि हमारे पास एक शरीर है जिससे हम इंद्रियों और मन को नियंत्रित कर सकते हैं। भौतिकवादी जीवन की जटिलता एक अनियंत्रित मन और अनियंत्रित इंद्रियों के कारण है। किसी को भी इस तरह के एक अच्छे मानवीय शरीर को प्राप्त करने के लिए भगवान के प्रति आभारी होना चाहिए और इसका उचित उपयोग करना चाहिए। एक पशु और एक मनुष्य के बीच का अंतर यह है कि पशु स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सकता है और उसमें शालीनता की समझ नहीं होती है, जबकि मनुष्य में शालीनता की समझ होती है और वह स्वयं को नियंत्रित कर सकता है। यदि यह नियंत्रण शक्ति मनुष्य द्वारा प्रदर्शित नहीं की जाती है, तो वह एक पशु से बेहतर नहीं है। इंद्रियों को नियंत्रित करके, या योग नियमन की प्रक्रिया द्वारा, कोई व्यक्ति अपने आत्मा, परमात्मा, दुनिया और उनके पारस्परिक संबंधों की स्थिति को समझ सकता है; इंद्रियों को नियंत्रित करके सब कुछ संभव है। अन्यथा, हम जानवरों से बेहतर नहीं हैं।
इंद्रियों को नियंत्रित करने के माध्यम से वास्तविक आत्म-साक्षात्कार यहाँ समझाया गया है। व्यक्ति को भगवान और साथ ही स्वयं को देखने की कोशिश करनी चाहिए। खुद को सर्वोच्च के समान समझना आत्म-साक्षात्कार नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि परम प्रभु अनादि या पुराण हैं, और उनका कोई अन्य कारण नहीं है। जीवित इकाई सर्वोच्च भगवान से भाग और पार्सल के रूप में जन्म लेती है। ब्रह्म-संहिता में पुष्टि की गई है, अनादिर् आदिर् गोविंदः: गोविंद, सर्वोच्च व्यक्ति, का कोई कारण नहीं है। वह अजन्मे हैं। लेकिन जीवित इकाई उनके द्वारा जन्म लेती है। जैसा कि भगवद्-गीता में पुष्टि की गई है, ममैवांशः: जीवित इकाई और सर्वोच्च प्रभु दोनों अजन्मे हैं, लेकिन यह समझना होगा कि भाग और पार्सल का सर्वोच्च कारण सर्वोच्च भगवान ही हैं। इसलिए ब्रह्म-संहिता कहती है कि सब कुछ सर्वोच्च भगवान (सर्व-कारण-कारणम) से आया है। वेदांत-सूत्र भी इस बात की पुष्टि करता है। जन्माद्यस्य यतः: परम सत्य सभी के जन्म का मूल स्रोत है। कृष्ण भी भगवद्-गीता में कहते हैं, अहं सर्वस्य प्रभवः: "मैं ब्रह्मा और भगवान शिव और जीवित प्राणियों सहित हर चीज के जन्म का स्रोत हूं।" यह आत्म-साक्षात्कार है। व्यक्ति को पता होना चाहिए कि वह परम प्रभु के नियंत्रण में है न कि यह सोचे कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र है। अन्यथा, उसे सशर्त जीवन में क्यों डाला जाना चाहिए?
