श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.31.17 
देह्यन्यदेहविवरे जठराग्निनासृग्-
विण्मूत्रकूपपतितो भृशतप्तदेह: ।
इच्छन्नितो विवसितुं गणयन्स्वमासान्
निर्वास्यते कृपणधीर्भगवन्कदा नु ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी माँ के गर्भ में खून, मल और मूत्र के गड्ढे में गिरकर और माँ के पेट की आग से झुलसी हुई देह के साथ, बाहर निकलने के लिए बेचैन आत्मा महीनों की गिनती करती रहती है और प्रार्थना करती है, "हे प्रभु, यह अभागा जीव कब इस कैद से मुक्त हो पाएगा?"
 
Having fallen into the pool of blood, feces and urine in the womb of his mother and being burnt by the gastric fire of his mother, the embodied soul, in eagerness to get out, keeps counting the months and prays, “O Lord, when will this unfortunate soul be released from this prison?”
तात्पर्य
माँ के गर्भ में रहने वाली जीवित इकाई की अनिश्चित स्थिति यहाँ वर्णित है। जहाँ बच्चा तैर रहा है उसके एक तरफ गैस्ट्रिक आग की गर्मी है, और दूसरी तरफ मूत्र, मल, रक्त और स्राव हैं। सात महीने के बाद बच्चा, जिसने अपनी चेतना वापस पा ली है, अपने अस्तित्व की भयावह स्थिति को महसूस करता है और भगवान से प्रार्थना करता है। अपनी रिहाई तक के महीनों की गिनती करते हुए, वह कारावास से बाहर निकलने के लिए बहुत उत्सुक हो जाता है। तथाकथित सभ्य मनुष्य जीवन की इस भयावह स्थिति को ध्यान में नहीं रखता है, और कभी-कभी, इंद्रिय संतुष्टि के उद्देश्य से, वह बच्चे को गर्भनिरोधक या गर्भपात के तरीकों से मारने की कोशिश करता है। गर्भ में भयावह स्थिति के बारे में अनिश्चित, ऐसे व्यक्ति भौतिकवाद में बने रहते हैं, मानव जीवन के अवसर का दुरुपयोग करते हैं।

इस श्लोक में कृपण-धीः शब्द महत्वपूर्ण है। धी का अर्थ है "बुद्धि," और कृपण का अर्थ है "कंजूस।" सशर्त जीवन उन लोगों के लिए है जो कंजूस बुद्धि के हैं या जो अपनी बुद्धि का ठीक से उपयोग नहीं करते हैं। मानव जीवन में बुद्धि विकसित होती है, और जन्म और मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने के लिए उस विकसित बुद्धि का उपयोग करना पड़ता है। जो ऐसा नहीं करता वह कंजूस होता है, जैसे कि कोई व्यक्ति जिसके पास बहुत अधिक धन होता है लेकिन उसका उपयोग नहीं करता, उसे केवल देखने के लिए रखता है। एक व्यक्ति जो वास्तव में जन्म और मृत्यु के चक्र, माया के चंगुल से बाहर निकलने के लिए अपनी मानवीय बुद्धि का उपयोग नहीं करता है, उसे कंजूस के रूप में स्वीकार किया जाता है। कंजूस के ठीक विपरीत उदार, "बहुत उदार" होता है। ब्राह्मण को उदार कहा जाता है क्योंकि वह आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए अपनी मानवीय बुद्धि का उपयोग करता है। वह उस बुद्धि का उपयोग जनता के लाभ के लिए कृष्ण चेतना का प्रचार करने के लिए करता है, और इसलिए वह उदार है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)