इस श्लोक में कृपण-धीः शब्द महत्वपूर्ण है। धी का अर्थ है "बुद्धि," और कृपण का अर्थ है "कंजूस।" सशर्त जीवन उन लोगों के लिए है जो कंजूस बुद्धि के हैं या जो अपनी बुद्धि का ठीक से उपयोग नहीं करते हैं। मानव जीवन में बुद्धि विकसित होती है, और जन्म और मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने के लिए उस विकसित बुद्धि का उपयोग करना पड़ता है। जो ऐसा नहीं करता वह कंजूस होता है, जैसे कि कोई व्यक्ति जिसके पास बहुत अधिक धन होता है लेकिन उसका उपयोग नहीं करता, उसे केवल देखने के लिए रखता है। एक व्यक्ति जो वास्तव में जन्म और मृत्यु के चक्र, माया के चंगुल से बाहर निकलने के लिए अपनी मानवीय बुद्धि का उपयोग नहीं करता है, उसे कंजूस के रूप में स्वीकार किया जाता है। कंजूस के ठीक विपरीत उदार, "बहुत उदार" होता है। ब्राह्मण को उदार कहा जाता है क्योंकि वह आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए अपनी मानवीय बुद्धि का उपयोग करता है। वह उस बुद्धि का उपयोग जनता के लाभ के लिए कृष्ण चेतना का प्रचार करने के लिए करता है, और इसलिए वह उदार है।
