प्राणी आगे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है और कहता है कि यह सांसारिक चक्र में फंसकर बार-बार जन्म लेता और मरता रहता है। यह अनमोल जीवन उसे शायद इसलिए मिला है क्योंकि वह भगवान को भूल गया है और भगवान से दूर चला गया है। भगवान की कृपा के बिना इस दिव्य प्रेम-भक्ति मार्ग में फिर से कैसे आ सकता है?
The soul further prays: The soul is subject to the influence of material nature and toils hard to continue the cycle of birth and death. This conditioned life is due to forgetfulness of one's relationship with the Lord. Therefore, how can one re-engage in transcendental loving devotion to the Lord without the Lord's grace?
तात्पर्य
मायावादी दार्शनिकों का मानना है कि सिर्फ मानसिक अटकलों द्वारा ज्ञान की खेती करके, कोई भी भौतिक बंधन की स्थिति से मुक्त हो सकता है। लेकिन यहाँ कहा गया है कि ज्ञान से नहीं बल्कि सर्वोच्च भगवान की दया से ही मुक्ति मिलती है। मानसिक अटकलों द्वारा, सशर्त आत्मा को जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, परम सत्य के निकट पहुँचने के लिए हमेशा अपूर्ण होता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान की दया के बिना, उनको या उनके वास्तविक रूप, गुण और नाम को नहीं समझा जा सकता है। जो लोग भक्ति सेवा में नहीं हैं, वे हजारों वर्षों से अनुमान लगाते रहते हैं, लेकिन फिर भी परम सत्य की प्रकृति को समझने में असमर्थ हैं। भगवान की दया से ही कोई परम सत्य के ज्ञान में मुक्त हो सकता है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हमारी स्मृति इसलिए खो गई है क्योंकि अब हम उनकी भौतिक ऊर्जा से आच्छादित हैं। तर्क दिए जा सकते हैं कि भगवान की सर्वोच्च इच्छा के कारण हमें इस भौतिक ऊर्जा के प्रभाव में क्यों डाला गया है। इसे भगवद-गीता में समझाया गया है, जहाँ भगवान कहते हैं, "मैं हर किसी के दिल में बैठा हूँ, और मेरे कारण ही कोई भूल जाता है या ज्ञान में जीवित रहता है।" सशर्त आत्मा का भूल जाना भी भगवान के निर्देशन के कारण है। एक जीवित इकाई अपनी थोड़ी स्वतंत्रता का दुरुपयोग तब करती है जब वह भौतिक प्रकृति पर शासन करना चाहता है। स्वतंत्रता का यह दुरुपयोग, जिसे माया कहा जाता है, हमेशा उपलब्ध रहता है, अन्यथा कोई स्वतंत्रता नहीं होगी। स्वतंत्रता का अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति इसका सही या गलत तरीके से उपयोग कर सकता है। यह स्थिर नहीं है, यह गतिशील है। इसलिए, स्वतंत्रता का दुरुपयोग माया से प्रभावित होने का कारण है। माया इतनी मजबूत है कि भगवान कहते हैं कि उनके प्रभाव को पार करना बहुत मुश्किल है। लेकिन कोई भी "अगर वह मुझे समर्पित हो जाए" तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। माम एव ये प्रपद्यते: जो कोई भी उनके आत्मसमर्पण करता है वह भौतिक प्रकृति के कड़े कानूनों के प्रभाव को पार कर सकता है। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उनकी इच्छा से एक जीवित इकाई माया के प्रभाव में डाली जाती है, और अगर कोई इस उलझाव से बाहर निकलना चाहता है, तो यह केवल उनकी दया से ही संभव हो सकता है। भौतिक प्रकृति के प्रभाव में सशर्त आत्माओं की गतिविधियों को यहाँ समझाया गया है। प्रत्येक सशर्त आत्मा भौतिक प्रकृति के प्रभाव में विभिन्न प्रकार के काम में लगी हुई है। हम भौतिक दुनिया में देख सकते हैं कि सशर्त आत्मा इतनी शक्तिशाली तरीके से कार्य करती है कि वह इंद्रिय तृप्ति के लिए भौतिक सभ्यता की तथाकथित प्रगति का निर्माण करने में आश्चर्यजनक रूप से खेल रही है। लेकिन वास्तव में उनकी स्थिति यह जानने की है कि वह भगवान का एक शाश्वत सेवक है। जब वह वास्तव में पूर्ण ज्ञान में होता है, तो वह जानता है कि भगवान सर्वोच्च पूजा करने योग्य वस्तु है और जीवित इकाई उनका शाश्वत सेवक है। इस ज्ञान के बिना, वह भौतिक गतिविधियों में संलग्न रहता है, जिसे अज्ञान कहा जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥