चूंकि जीवित इकाई की पहचान बहुत सूक्ष्म है, वह भौतिक प्रकृति के अधीन होने का खतरा है, लेकिन जब वह इस भौतिक शरीर से मुक्त हो जाता है, तो वह झूठा होता है, वह सर्वोच्च प्रभु के समान आध्यात्मिक प्रकृति प्राप्त करता है। उस समय उसके और सर्वोच्च प्रभु के बीच कोई गुणात्मक अंतर नहीं होता है, लेकिन क्योंकि वह इतना मात्रात्मक रूप से शक्तिशाली नहीं है कि वह कभी भी भौतिक प्रकृति के प्रभाव में न आए, वह मात्रात्मक रूप से प्रभु से अलग है।
भक्ति सेवा की संपूर्ण प्रक्रिया इस भौतिक प्रकृति के संदूषण से खुद को शुद्ध करना और खुद को आध्यात्मिक मंच पर रखना है, जहां वह गुणात्मक रूप से सर्वोच्च ईश्वर के साथ एक है। वेदों में कहा गया है कि जीवित इकाई हमेशा स्वतंत्र है। असांगो है ayam पुरुषः। जीवित इकाई मुक्त हो गई है। उसका भौतिक संदूषण अस्थायी है, और उसकी वास्तविक स्थिति यह है कि वह मुक्त है। यह मुक्ति कृष्ण चेतना द्वारा प्राप्त की जाती है, जो समर्पण के बिंदु से शुरू होती है। इसलिए यहाँ यह कहा गया है, "मैं सर्वोच्च व्यक्ति को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।"
