श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.31.14 
य: पञ्चभूतरचिते रहित: शरीरे
च्छन्नोऽयथेन्द्रियगुणार्थचिदात्मकोऽहम् ।
तेनाविकुण्ठमहिमानमृषिं तमेनं
वन्दे परं प्रकृतिपूरुषयो: पुमांसम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
मैं इस पंचभूतों से बने इस भौतिक शरीर के कारण परमेश्वर से अलग हो गया हूँ, इसलिए मेरे गुणों और इंद्रियों का दुरुपयोग हो रहा है, जबकि मैं मूल रूप से आध्यात्मिक हूँ। चूंकि भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व दिव्य हैं, प्रकृति और जीवों से परे हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा भौतिक शरीर नहीं है, और क्योंकि उनके आध्यात्मिक गुण हमेशा गौरवशाली होते हैं, इसलिए मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।
 
Because I am in this material body composed of the five elements, I am separated from the Supreme Lord and my qualities and senses are being misused, although I am essentially spiritual. Since the Lord is beyond nature and the living entity, as He is devoid of such a material body, and since His spiritual qualities are glorious, I offer my obeisances unto Him.
तात्पर्य
जीवित इकाई और सर्वोच्च ईश्वर व्यक्ति के बीच अंतर यह है कि जीवित इकाई भौतिक प्रकृति के अधीन होने के लिए प्रवण होता है, जबकि सर्वोच्च ईश्वर व्यक्ति हमेशा भौतिक प्रकृति के साथ-साथ जीवित इकाइयों के लिए भी पारलौकिक होता है। जब जीवित इकाई को भौतिक प्रकृति में डाल दिया जाता है, तो उसकी इंद्रियां और गुण प्रदूषित या निर्दिष्ट होते हैं। सर्वोच्च प्रभु के लिए भौतिक गुणों या भौतिक इंद्रियों द्वारा सन्निहित होने की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि वह भौतिक प्रकृति के प्रभाव से ऊपर है और संभवतः जीवित इकाइयों की तरह अज्ञानता के अंधेरे में नहीं डाला जा सकता है। अपने पूर्ण ज्ञान की वजह से, वह कभी भी भौतिक प्रकृति के प्रभाव के अधीन नहीं है। भौतिक प्रकृति हमेशा उनके नियंत्रण में रहती है, और इसलिए यह संभव नहीं है कि भौतिक प्रकृति सर्वोच्च ईश्वर व्यक्ति को नियंत्रित कर सके।

चूंकि जीवित इकाई की पहचान बहुत सूक्ष्म है, वह भौतिक प्रकृति के अधीन होने का खतरा है, लेकिन जब वह इस भौतिक शरीर से मुक्त हो जाता है, तो वह झूठा होता है, वह सर्वोच्च प्रभु के समान आध्यात्मिक प्रकृति प्राप्त करता है। उस समय उसके और सर्वोच्च प्रभु के बीच कोई गुणात्मक अंतर नहीं होता है, लेकिन क्योंकि वह इतना मात्रात्मक रूप से शक्तिशाली नहीं है कि वह कभी भी भौतिक प्रकृति के प्रभाव में न आए, वह मात्रात्मक रूप से प्रभु से अलग है।

भक्ति सेवा की संपूर्ण प्रक्रिया इस भौतिक प्रकृति के संदूषण से खुद को शुद्ध करना और खुद को आध्यात्मिक मंच पर रखना है, जहां वह गुणात्मक रूप से सर्वोच्च ईश्वर के साथ एक है। वेदों में कहा गया है कि जीवित इकाई हमेशा स्वतंत्र है। असांगो है ayam पुरुषः। जीवित इकाई मुक्त हो गई है। उसका भौतिक संदूषण अस्थायी है, और उसकी वास्तविक स्थिति यह है कि वह मुक्त है। यह मुक्ति कृष्ण चेतना द्वारा प्राप्त की जाती है, जो समर्पण के बिंदु से शुरू होती है। इसलिए यहाँ यह कहा गया है, "मैं सर्वोच्च व्यक्ति को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)