श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.31.13 
यस्त्वत्र बद्ध इव कर्मभिरावृतात्मा
भूतेन्द्रियाशयमयीमवलम्ब्य मायाम् ।
आस्ते विशुद्धमविकारमखण्डबोधम्
आतप्यमानहृदयेऽवसितं नमामि ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
मैं, शुद्ध आत्मा, अपनी गतिविधियों से बँधा हुआ, माया की व्यवस्था से इस समय अपनी माता के गर्भ में पड़ा हुआ हूँ। मैं उन भगवान् को नमन करता हूँ जो यहाँ मेरे साथ हैं, किन्तु जो अप्रभावित हैं और अपरिवर्तनशील हैं। वे अनंत हैं, किन्तु संतप्त हृदय में देखे जाते हैं। मैं उन्हें सादर नमन करता हूँ।
 
I, a pure soul, bound by my own karma, am now lying in my mother's womb by the law of Maya. I offer my obeisances unto the Supreme Personality of Godhead, who is here with me, but who is unaffected and unchangeable. He is infinite, but is seen in the troubled heart. I offer my obeisances unto Him.
तात्पर्य
जैसा कि पिछली आयत में कहा गया है, जीव आत्मा कहती है, "मैं सर्वोच्च प्रभु का आश्रय लेता हूँ।" इसलिए, संवैधानिक रूप से, जीव आत्मा भगवान के व्यक्तित्व के सर्वोच्च आत्मा का अधीनस्थ सेवक है। जैसा कि उपनिषदों में पुष्टि की गई है, सर्वोच्च आत्मा और जीव आत्मा दोनों एक ही शरीर में बैठे हैं। वे मित्रों के रूप में बैठे हैं, लेकिन एक पीड़ित है, और दूसरा दुख से अलग है।

इस आयत में कहा गया है, विशुद्धम् अविचारम् अखण्ड-बोद्धम्: परमात्मा हमेशा सभी संदूषणों से अलग बैठता है। जीवित इकाई दूषित और पीड़ित है क्योंकि उसके पास एक भौतिक शरीर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि क्योंकि भगवान भी उसके साथ है, उसके पास भी एक भौतिक शरीर है। वह अविचारम् है, अपरिवर्तनीय है। वह हमेशा वही सर्वोच्च है, लेकिन दुर्भाग्य से मायावादी दार्शनिक, अपने अशुद्ध दिलों के कारण, यह समझ नहीं पाते हैं कि सर्वोच्च आत्मा, परमात्मा, व्यक्तिगत आत्मा से अलग है। यहाँ कहा गया है, आताप्यमान-हृदय अवासीतम्: वह हर जीवित इकाई के हृदय में है, लेकिन उसे केवल एक पश्चाताप करने वाली आत्मा द्वारा ही महसूस किया जा सकता है। व्यक्तिगत आत्मा पश्चाताप करती है कि वह अपने संवैधानिक स्थिति को भूल गया, सर्वोच्च आत्मा के साथ एक बनना चाहता था और भौतिक प्रकृति पर शासन करने की पूरी कोशिश की। वह चकित हो गया है, और इसलिए वह पश्चाताप करता है। उस समय, परमात्मा, या परमात्मा और व्यक्तिगत आत्मा के बीच संबंध, महसूस किया जाता है। जैसा कि भगवद-गीता में पुष्टि की गई है, कई, कई जन्मों के बाद ज्ञान नियंत्रित आत्मा को आता है कि वासुदेव महान है, वह गुरु है, और वह भगवान है। व्यक्तिगत आत्मा नौकर है, और इसलिए वह उसके सामने आत्मसमर्पण करता है। उस समय वह एक महात्मा, एक महान आत्मा बन जाता है। इसलिए, एक भाग्यशाली जीव जो इस समझ में आता है, अपनी माँ के गर्भ के भीतर भी, उसकी मुक्ति निश्चित है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)