इस आयत में कहा गया है, विशुद्धम् अविचारम् अखण्ड-बोद्धम्: परमात्मा हमेशा सभी संदूषणों से अलग बैठता है। जीवित इकाई दूषित और पीड़ित है क्योंकि उसके पास एक भौतिक शरीर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि क्योंकि भगवान भी उसके साथ है, उसके पास भी एक भौतिक शरीर है। वह अविचारम् है, अपरिवर्तनीय है। वह हमेशा वही सर्वोच्च है, लेकिन दुर्भाग्य से मायावादी दार्शनिक, अपने अशुद्ध दिलों के कारण, यह समझ नहीं पाते हैं कि सर्वोच्च आत्मा, परमात्मा, व्यक्तिगत आत्मा से अलग है। यहाँ कहा गया है, आताप्यमान-हृदय अवासीतम्: वह हर जीवित इकाई के हृदय में है, लेकिन उसे केवल एक पश्चाताप करने वाली आत्मा द्वारा ही महसूस किया जा सकता है। व्यक्तिगत आत्मा पश्चाताप करती है कि वह अपने संवैधानिक स्थिति को भूल गया, सर्वोच्च आत्मा के साथ एक बनना चाहता था और भौतिक प्रकृति पर शासन करने की पूरी कोशिश की। वह चकित हो गया है, और इसलिए वह पश्चाताप करता है। उस समय, परमात्मा, या परमात्मा और व्यक्तिगत आत्मा के बीच संबंध, महसूस किया जाता है। जैसा कि भगवद-गीता में पुष्टि की गई है, कई, कई जन्मों के बाद ज्ञान नियंत्रित आत्मा को आता है कि वासुदेव महान है, वह गुरु है, और वह भगवान है। व्यक्तिगत आत्मा नौकर है, और इसलिए वह उसके सामने आत्मसमर्पण करता है। उस समय वह एक महात्मा, एक महान आत्मा बन जाता है। इसलिए, एक भाग्यशाली जीव जो इस समझ में आता है, अपनी माँ के गर्भ के भीतर भी, उसकी मुक्ति निश्चित है।
