श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.31.12 
जन्तुरुवाच
तस्योपसन्नमवितुं जगदिच्छयात्त-
नानातनोर्भुवि चलच्चरणारविन्दम् ।
सोऽहं व्रजामि शरणं ह्यकुतोभयं मे
येनेद‍ृशी गतिरदर्श्यसतोऽनुरूपा ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
मैं उस परमेश्वर के कमल चरणों में शरण लेता हूं, जो अपने विविध नित्य रूपों में प्रकट होते हैं और इस दुनिया में विचरण करते हैं। मैं केवल उन्हीं की शरण लेता हूं, क्योंकि वही मुझे सभी भयों से मुक्ति दिला सकते हैं और उन्हीं से मुझे यह जीवन स्थिति प्राप्त हुई है, जो मेरे पाप कर्मों के अनुरूप है।
 
The living entity says: I take refuge in the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead who appears in His various eternal forms and roams on this earth. I take refuge in Him because He alone can make me fearless and it is from Him that I have received this state of life, which is exactly in accordance with my impure activities.
तात्पर्य
हिंदी पाठ :

कलाच-चरणारविन्दम शब्द भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का उल्लेख करता है, जो वास्तव में दुनिया की सतह पर चलते या यात्रा करते हैं। उदाहरण के लिए, भगवान रामचंद्र वास्तव में दुनिया की सतह पर चले थे, और भगवान कृष्ण भी एक सामान्य व्यक्ति की तरह चले थे। इसलिए प्रार्थना सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान को अर्पित की जाती है, जो पवित्रों के संरक्षण और अधर्मियों के विनाश के लिए इस पृथ्वी की सतह या इस ब्रह्मांड के किसी भी हिस्से पर अवतरित होते हैं। भगवद-गीता में इस बात की पुष्टि की गई है कि जब अधर्म बढ़ता है और वास्तविक धार्मिक गतिविधियों में विसंगतियाँ पैदा होती हैं, तो परम भगवान पवित्रों की रक्षा करने और अधर्मियों को मारने के लिए आते हैं। यह श्लोक भगवान कृष्ण की ओर इशारा करता है।

इस श्लोक में एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि भगवान अपनी इच्छा से स्वयं आते हैं। जैसा कि कृष्ण भगवद-गीता में पुष्टि करते हैं, सम्भावम्य आत्मा-मायाय: "मैं अपनी इच्छा से, अपनी आंतरिक शक्ति से प्रकट होता हूं।" उन्हें भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा आने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है। यहाँ कहा गया है, इच्छयी: वह कोई रूप धारण नहीं करते हैं, जैसा कि अवैयक्तिकवादी सोचते हैं, क्योंकि वह अपनी इच्छा से आते हैं, और जिस रूप में वह अवतरित होते हैं वह उनका शाश्वत रूप है। जैसे परम भगवान जीवित इकाई को भयानक अस्तित्व की स्थिति में डालते हैं, वैसे ही वे उसे मुक्त भी कर सकते हैं, और इसलिए व्यक्ति को कृष्ण के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए। कृष्ण मांग करते हैं, "सब कुछ छोड़ दो और मेरे समर्पण करो।" और यह भी कहा गया है कि कोई भी जो उनके पास जाता है उसे भौतिक अस्तित्व में फिर से रूप प्राप्त करने के लिए वापस नहीं आता है, बल्कि भगवान के पास वापस जाता है, वापस घर, कभी वापस नहीं आना है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)