सब कुछ भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की देखरेख में किया जाता है। भौतिक प्रकृति शरीर की आपूर्ति करती है, लेकिन वह परमआत्मा के निर्देश पर ऐसा करती है। भगवद-गीता में कहा गया है कि एक जीव भौतिक प्रकृति द्वारा बनाए गए रथ पर इस भौतिक दुनिया में भटक रहा है। सर्वोच्च भगवान, परमात्मा के रूप में, हमेशा व्यक्तिगत आत्मा के साथ मौजूद होते हैं। वह भौतिक प्रकृति को निर्देश देता है कि वह व्यक्तिगत आत्मा को उसके कार्य के परिणाम के अनुसार एक विशेष प्रकार का शरीर प्रदान करे, और भौतिक प्रकृति उसे प्रदान करती है। यहाँ एक शब्द, रेटः-कण-आश्रयहा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इंगित करता है कि यह किसी पुरुष का वीर्य नहीं है जो एक महिला के गर्भ के भीतर जीवन बनाता है; बल्कि, जीवित इकाई, आत्मा, वीर्य के एक कण में शरण लेती है और फिर उसे एक महिला के गर्भ में धकेल दिया जाता है। तब शरीर विकसित होता है। केवल संभोग से आत्मा की उपस्थिति के बिना एक जीवित इकाई बनाने की कोई संभावना नहीं है। भौतिकवादी सिद्धांत कि कोई आत्मा नहीं है और एक बच्चा केवल शुक्राणु और डिंब के भौतिक संयोजन से पैदा होता है, बहुत व्यवहार्य नहीं है। यह अस्वीकार्य है।
